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इसरो के द्वारा जो 6666 उपग्रह लांच किया गया है हाल ही में उसका जो फायदा हुआ है वह एक तरह से नेटवर्क कम्युनिकेशन नेटवर्क मैनेजमेंट टेक्निक्स को जो इंप्लीमेंट करता है वह उस टाइप का विवाह से जो कम्युनिके...
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इसरो के द्वारा जो 6666 उपग्रह लांच किया गया है हाल ही में उसका जो फायदा हुआ है वह एक तरह से नेटवर्क कम्युनिकेशन नेटवर्क मैनेजमेंट टेक्निक्स को जो इंप्लीमेंट करता है वह उस टाइप का विवाह से जो कम्युनिकेशन और एडवांसमेंट लाएगा और और फास्ट तेजी से और उतने ही अच्छे से जो है मुकाम वेकेशन करने में मदद करेगाIsro Ke Dwara Jo 6666 Upgrah Launch Kiya Gaya Hai Haal Hi Mein Uska Jo Fayda Hua Hai Wah Ek Tarah Se Network Communication Network Management Techniques Ko Jo Implement Karta Hai Wah Us Type Ka Vivah Se Jo Communication Aur Edavansament Layega Aur Aur Fast Teji Se Aur Utne Hi Acche Se Jo Hai Mukam Vacation Karne Mein Madad Karega
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ऐश्वर्या ने इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन जो इस समय छोटी-छोटी सेटेलाइट क्या बनाने की तैयारी कर रहा है सस्ती और छोटी सैटेलाइट अंतरिक्ष में जा सके और एक बड़ी तौर पर एक मिशन की तैयारी कर रहा है जो एक्...
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ऐश्वर्या ने इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन जो इस समय छोटी-छोटी सेटेलाइट क्या बनाने की तैयारी कर रहा है सस्ती और छोटी सैटेलाइट अंतरिक्ष में जा सके और एक बड़ी तौर पर एक मिशन की तैयारी कर रहा है जो एक्शन की स्टडी सूर्य की स्टडी के लिए आदित्य 23:00 पर कक्षा 8 लाइट को भेजने की तैयारी कर रहा है जो साल 2019 लांच होने के लिए तैयारी की जा रही हैAishwarya Ne Indian Space Research Organisation Jo Is Samay Choti Choti Satellite Kya Banane Ki Taiyari Kar Raha Hai Sasti Aur Choti Satellite Antariksh Mein Ja Sake Aur Ek Badi Taur Par Ek Mission Ki Taiyari Kar Raha Hai Jo Action Ki Study Surya Ki Study Ke Liye Aditya 23:00 Par Kaksha 8 Light Ko Bhejne Ki Taiyari Kar Raha Hai Jo Saal 2019 Launch Hone Ke Liye Taiyari Ki Ja Rahi Hai
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बिल्कुल जी हां के अध्यक्ष मिक्स प्लेयर किरण कुमार जी ने बताया है कि तू तो ऑनलाइन में सूर्य कमीशन स्टार्ट हो रहा है आदित्य एल्बम मिशन के नाम से बेफिक्रे जो मैंने बोला मिशन का स्कोर यह है प्रूफ करना है ...
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बिल्कुल जी हां के अध्यक्ष मिक्स प्लेयर किरण कुमार जी ने बताया है कि तू तो ऑनलाइन में सूर्य कमीशन स्टार्ट हो रहा है आदित्य एल्बम मिशन के नाम से बेफिक्रे जो मैंने बोला मिशन का स्कोर यह है प्रूफ करना है हमारे जो अंडरस्टेंडिंग HD डायनामिक प्रोसेस होती हैं उनके आसपास उस चीज को समझने के लिए ही उसको अनफ्रेंड करने के लिए इस महीने Scorpio है मीनिंग है और इसका जो पर्पस है जो तजो मन डलहौजी पब्लिक सर्विस को करना है बेसिकली जो सूर्य से रिलेटेड होती है स्वतंत्र रिलेटिव अल्ट्रावायलेट रेज़ होती है इन सब को कस्टडी करना है अभी से यह क्या है किसके साथ हो लंच में की साथियां प्रॉपर्टीज है क्या चल रहा खेल होता है 16 घंटे चलती है कितना राजय डिस्ट्रीब्यूट होता है कितना बेनिफिट करता है कितना टैबलेट रेट स्वीकृति यह सारी चीजें स्कूल में पताBilkul Ji Haan Ke Adhyaksh Mix Player Kiran Kumar Ji Ne Bataya Hai Ki Tu To Online Mein Surya Commision Start Ho Raha Hai Aditya Album Mission Ke Naam Se Befikre Jo Maine Bola Mission Ka Score Yeh Hai Proof Karna Hai Hamare Jo Andarastending HD Dynamic Process Hoti Hain Unke Aaspass Us Cheez Ko Samjhne Ke Liye Hi Usko Anafrend Karne Ke Liye Is Mahine Scorpio Hai Meaning Hai Aur Iska Jo Purpose Hai Jo Tajo Man Dalhousie Public Service Ko Karna Hai Basically Jo Surya Se Related Hoti Hai Swatantra Relative Altrawaylet Rez Hoti Hai In Sab Ko Custody Karna Hai Abhi Se Yeh Kya Hai Kiske Saath Ho Lunch Mein Ki Sathiyan Properties Hai Kya Chal Raha Khel Hota Hai 16 Ghante Chalti Hai Kitna Rajay Distribyut Hota Hai Kitna Benefit Karta Hai Kitna Tablet Rate Swikriti Yeh Saree Cheezen School Mein Pata
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जी बिल्कुल बीएससी फिजिक्स के बाद आप शुरू में एडमिशन ऐसा साइंटिस्ट ले सकते हैं वैसे मैं आपको बता दूंगी ट्वेल्थ के बाद भी आप इसमें एंट्री ले सकते हैं शुरु में एक-एक जाम होती जो इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सा...
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जी बिल्कुल बीएससी फिजिक्स के बाद आप शुरू में एडमिशन ऐसा साइंटिस्ट ले सकते हैं वैसे मैं आपको बता दूंगी ट्वेल्थ के बाद भी आप इसमें एंट्री ले सकते हैं शुरु में एक-एक जाम होती जो इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस बैंगलोर या इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी तिरुवनंतपुरम में ट्वेल्थ के बाद एडमिशन के लिए मौके देती है बात करेंगे अब आप साइंटिस्ट के लिए अगर इस रोमांटिक जाते हैं तो मैं आपको एक चीज बता सकते हैं कि आपके बीएससी फिजिक्स के बाद बहुत सारी ट्रेनी ऑफिसJi Bilkul Bsc Physics Ke Baad Aap Shuru Mein Admission Aisa Scientist Le Sakte Hain Waise Main Aapko Bata Dungi Twelfth Ke Baad Bhi Aap Isme Entry Le Sakte Hain Shuru Mein Ek Ek Jam Hoti Jo Indian Institute Of Science Bangalore Ya Indian Institute Of Space Science End Technology Tiruvanantapuram Mein Twelfth Ke Baad Admission Ke Liye Mauke Deti Hai Baat Karenge Ab Aap Scientist Ke Liye Agar Is Romantic Jaate Hain To Main Aapko Ek Cheez Bata Sakte Hain Ki Aapke Bsc Physics Ke Baad Bahut Saree Treni Office
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इसरो के अध्यक्ष किरण कुमार जी ने कहा है कि वह प्राइवेट बेल्ट स्पेस रॉकेट 2021 में लॉन्च करने वाले हैं यानी कि ऐसा रॉकेट जो पूरी तरह प्राइवेट इंडस्ट्री ने बनाया है अभी तक सोए करो यही पीएसएलवी यानी पोलर...
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इसरो के अध्यक्ष किरण कुमार जी ने कहा है कि वह प्राइवेट बेल्ट स्पेस रॉकेट 2021 में लॉन्च करने वाले हैं यानी कि ऐसा रॉकेट जो पूरी तरह प्राइवेट इंडस्ट्री ने बनाया है अभी तक सोए करो यही पीएसएलवी यानी पोलर सैटलाइट लॉन्च वेहिकल का मैन्यूफैक्चर था देखा जाए तो नॉर्मल साइज पीएसएलवी के लिए अबाउट 3248 लगता है और सैटेलाइट को स्पेस में पहुंचाने के लिए कौन सी भी बहुत ज्यादा लगती है यह जो प्राइवेट वर्ल्ड स्पेस रॉकेट है उसके 2021 में लॉन्च करने का यह लाभ होगा कि ट्विन रिड्यूस द कॉस्ट ऑफ टेक्स्ट टू स्पीच यानी कि नॉर्मल पीएसएलवी का जो कॉस्ट है उसे बनवाई 10th कॉल से हमें लगेगा चाइना भी अभी सैटेलाइट लॉन्च करने का कोर्स वीडियोस करने के विचार में है या नहीं वह इससे फॉर रेंट से मुझको हटा कर सकती अगर हमारा यह 2021 का लोन सक्सेसफुल रहा तो हम भी ज्यादा से ज्यादा सेटेलाइट लॉन्च कर सकते हैं कम सोचनाIsro Ke Adhyaksh Kiran Kumar Ji Ne Kaha Hai Ki Wah Private Belt Space Rocket 2021 Mein Launch Karne Wale Hain Yani Ki Aisa Rocket Jo Puri Tarah Private Industry Ne Banaya Hai Abhi Tak Soye Karo Yahi PSLV Yani Polar Satellite Launch Vehicle Ka Mainyufaikchar Tha Dekha Jaye To Normal Size PSLV Ke Liye About 3248 Lagta Hai Aur Satellite Ko Space Mein Pahunchane Ke Liye Kaun Si Bhi Bahut Jyada Lagti Hai Yeh Jo Private World Space Rocket Hai Uske 2021 Mein Launch Karne Ka Yeh Labh Hoga Ki Twin Reduce D Cost Of Text To Speech Yani Ki Normal PSLV Ka Jo Cost Hai Use Banwai 10th Call Se Hume Lagega China Bhi Abhi Satellite Launch Karne Ka Course Videos Karne Ke Vichar Mein Hai Ya Nahi Wah Isse For Rent Se Mujhko Hata Kar Sakti Agar Hamara Yeh 2021 Ka Loan Successful Raha To Hum Bhi Jyada Se Jyada Satellite Launch Kar Sakte Hain Kum Sochna
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देखिए इस्लामिक नया 1 शुरू करने वाला है कि वो जो अपने जून की नेक्स्ट लॉन्च होंगी मुझे प्राइवेट डांस करेंगे आने की प्राइवेट कंपनीज हेल्प करेंगे इसरो के नए लोकेशन सेटेलाइट लांच करने में 2020 तक का यह मिश...
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देखिए इस्लामिक नया 1 शुरू करने वाला है कि वो जो अपने जून की नेक्स्ट लॉन्च होंगी मुझे प्राइवेट डांस करेंगे आने की प्राइवेट कंपनीज हेल्प करेंगे इसरो के नए लोकेशन सेटेलाइट लांच करने में 2020 तक का यह मिशन है कि 2020 तक साईं प्रोसेस कंप्लीट हो जाए और प्राइवेट कंपनी सौरव की मदद से कोई नहीं जो कोई रो कर दिल खुश है वह लॉन्च किया जाए हिंदी की इसरो के मुताबिक होने अभी 16000 लोगों की जरूरत है जो उनके स्पेस मिशन में उनकी उनकी के पास जाती है ट्रेन मेट्रो की लेकिन यह काफी नहीं है जो सूखी एम सबसे अजीब करने के लिए प्राइवेटाइजेशन से फायदा होगा एक तू जो पैसे हैं वह डिजाइन हो जाएंगे यानी कि फाइनेंसियल इशारे से सरकार पर या कॉमेंट पर या टैक्सपेयर्स पर नहीं आएगा डायरेक्टली मगर प्राइवेटाइजेशन जाएगी तो प्राइवेट कंपनीज भी फाइनली सपोर्ट करेंगे दूसरा भी है वर्ल्ड वाइड होता है बाकी सारे देशों में भी प्राइवेट कंपनीज है जो रॉकेट बनाना है जैसे बड़े-बड़े आर्गेनाइजेशन स्कोर देती हैं तो इंडिया में भी होने के बाद आप एक और स्टेट डेवलपमेंट की तरफ बढ़ जाएंगे विक्रम बात करें कि कौन से लोग जो इंडिया में कोई इंटरेस्ट रेट है तो मुझे लगता है जो भी बड़े बड़े फोटो में पर्स बनाने वाली कंपनी है जो बड़ी-बड़ी गाड़ियां बनाने वाले याद ऐसे भी कर खाने वाले कंपनी से वह इंटरेस्टेड होंगे या जो पहले Star बेस्ट कंपनी है जैसे कि टाटा को ले लीजिए हो सकता है वह इंटरेस्टेड हो और नए स्टार्टअप सुननाDekhie Islamic Naya 1 Shuru Karne Wala Hai Ki Vo Jo Apne June Ki Next Launch Hongi Mujhe Private Dance Karenge Aane Ki Private Companies Help Karenge Isro Ke Naye Location Satellite Launch Karne Mein 2020 Tak Ka Yeh Mission Hai Ki 2020 Tak Saayee Process Complete Ho Jaye Aur Private Company Saurav Ki Madad Se Koi Nahi Jo Koi Ro Kar Dil Khush Hai Wah Launch Kiya Jaye Hindi Ki Isro Ke Mutabik Hone Abhi 16000 Logon Ki Zaroorat Hai Jo Unke Space Mission Mein Unki Unki Ke Paas Jati Hai Train Metro Ki Lekin Yeh Kafi Nahi Hai Jo Sukhi Em Sabse Ajib Karne Ke Liye Privatisation Se Fayda Hoga Ek Tu Jo Paise Hain Wah Design Ho Jaenge Yani Ki Financial Ishare Se Sarkar Par Ya Cament Par Ya Taiksapeyars Par Nahi Aayega Directly Magar Privatisation Jayegi To Private Companies Bhi Finally Support Karenge Doosra Bhi Hai World Wide Hota Hai Baki Sare Deshon Mein Bhi Private Companies Hai Jo Rocket Banana Hai Jaise Bade Bade Organisation Score Deti Hain To India Mein Bhi Hone Ke Baad Aap Ek Aur State Development Ki Taraf Badh Jaenge Vikram Baat Karen Ki Kaun Se Log Jo India Mein Koi Interest Rate Hai To Mujhe Lagta Hai Jo Bhi Bade Bade Photo Mein Purse Banane Wali Company Hai Jo Badi Badi Gadiyan Banane Wale Yaad Aise Bhi Kar Khane Wale Company Se Wah Interested Honge Ya Jo Pehle Star Best Company Hai Jaise Ki Tata Ko Le Lijiye Ho Sakta Hai Wah Interested Ho Aur Naye Startup Sunna
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जिद के बिल्कुल हीरो जो है वह चंद्रमा पर मानव मिशन भेजने में बिल्कुल ही सक्षम है बल्कि वह से ज्यादा करने में सक्षम है क्योंकि आप देख सकते हैं कि कई चीजों में मोर नाचा को टक्कर दे रहा है और वह कैसे करे ...
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जिद के बिल्कुल हीरो जो है वह चंद्रमा पर मानव मिशन भेजने में बिल्कुल ही सक्षम है बल्कि वह से ज्यादा करने में सक्षम है क्योंकि आप देख सकते हैं कि कई चीजों में मोर नाचा को टक्कर दे रहा है और वह कैसे करे जाते 100 सेट लाइट से एक साथ लॉन्च की थी इसरो ने कई देशों का मिलाकर उसने रसिया यहां तक कि अमेरिका कभी कैसेट लाइट तो है ही सुनो ने अपने रॉकेट मेला के जो है उस देश में भेजा था वही करो जो है वह कई मामले में आज तक पहुंच रहा है उनको भी कंपटीशन दे रहा है और सब डिस्ट्रिक्ट चेंज है वह लास्ट डेट में आया है इस Rowdy अडियो मैं और जोक्स मैं समझता हूं कि उसमें बहुत बड़ा योगदान जो है वह डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जो इंडिया के पूर्व राष्ट्रपति रह चुके हैं उनका था तुम बिल्कुल निशुल्क जो है वह पूरी तरह सक्षम सक्षम है जो चीजें नाश्ता कर सकती है उन चीजों को करने में और जो चीज है जो भारत के लिए जरूरी हैं उन चीजों को पूर्ण करने के लिएJid Ke Bilkul Hero Jo Hai Wah Chandrama Par Manav Mission Bhejne Mein Bilkul Hi Saksham Hai Balki Wah Se Jyada Karne Mein Saksham Hai Kyonki Aap Dekh Sakte Hain Ki Kai Chijon Mein More Nacha Ko Takkar De Raha Hai Aur Wah Kaise Kare Jaate 100 Set Light Se Ek Saath Launch Ki Thi Isro Ne Kai Deshon Ka Milakar Usne Rasiya Yahan Tak Ki America Kabhi Kaiset Light To Hai Hi Suno Ne Apne Rocket Mela Ke Jo Hai Us Desh Mein Bheja Tha Wahi Karo Jo Hai Wah Kai Mamle Mein Aaj Tak Pahunch Raha Hai Unko Bhi Competition De Raha Hai Aur Sab District Change Hai Wah Last Date Mein Aaya Hai Is Rowdy Adiyo Main Aur Jokes Main Samajhata Hoon Ki Usamen Bahut Bada Yogdan Jo Hai Wah Doctor Apj Abdul Kalam Jo India Ke Purv Rashtrapati Rah Chuke Hain Unka Tha Tum Bilkul Nishulk Jo Hai Wah Puri Tarah Saksham Saksham Hai Jo Cheezen Nashta Kar Sakti Hai Un Chijon Ko Karne Mein Aur Jo Cheez Hai Jo Bharat Ke Liye Zaroori Hain Un Chijon Ko Poorn Karne Ke Liye
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ट्रू इतना सस्ता रॉकेट मिशन कैसे लॉन्च करता है उसके पीछे कैसा भी हो जाए मैं आपको बताने वाला हूं पहला है टेक्नोलॉजी अडॉप्टेशन मतलब शुरू क्या करता है कि पुरानी टेक्नोलॉजी उसको यूज करता है अपने नए मिशंस म...
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ट्रू इतना सस्ता रॉकेट मिशन कैसे लॉन्च करता है उसके पीछे कैसा भी हो जाए मैं आपको बताने वाला हूं पहला है टेक्नोलॉजी अडॉप्टेशन मतलब शुरू क्या करता है कि पुरानी टेक्नोलॉजी उसको यूज करता है अपने नए मिशंस में वही जो दूसरी बड़ी बड़ी कंपनी से नाश्ता हो गई और भी कई सारी है बोलो हर नई मिशन के लिए नई टेक्नोलॉजी बनाने की कोशिश करती हैं जिसमें पैसे का खर्चा बहुत ज्यादा होता है पहला डीजल और इसका एग्जांपल यह है कि अपने एसएलवी का नाम सुना हुआ सैटेलाइट लांच वही कर इसका जो इंजन था उन्होंने यूज़ किया Apple इंजन में पुराने इंजन को यूज कर लिया अब आप सोचिए कि कितना पैसा और कितनी टेक्नोलॉजी का पैसा इसमें बचत हुआ सबसे बड़ा रीजन की है अगले 20 दिन में आपको बताता हूं कि अगला रीजन यह है कि कोई भी बड़ी बड़ी कंपनी से होती है जो नासा हो गई बोलो क्या करते हैं किसी भी मिशन को चेक करने के लिए उसकी तीन फिजिकल मॉडल बनाते हैं सेटेलाइट के और टेस्ट करते हैं भाई पैसों की बात करूं मैं बहुत अपना सिस्टम सॉफ्टवेयर ऑफ कंप्यूटर का और उनकी टेक्नोलॉजी इसका इस तरीके से यूज करता है कि वह एक फाइनल मॉडल बनाता है और उसी को सीधे लॉन्च कर देता है सोचिए और सबसे ज्यादा पैसा इसी में खर्च होता है अदर कंपनी इसका सिर्फ 1 फिजिकल मॉडल से काम हो जाता है वही उधर 333 मॉडल बनाए जाते हैं किसने स्टार्ट किया था ना पर उस टाइम भारत बहुत गरीबी में था तो उन्होंने बहुत मेहनत करी और उन्होंने जिस तरीके से मेहनत करी आपको जानते कि कब कैसे क्या करना है जिससे कि मनी और टाइम दोनों सेव हो सके और साथ ही साथ भारत के लोग ज्यादा टाइम देते हैं इस मिशन में और साथ के साथ भारत की जो लेबर कॉस्ट है वह काफी कम है और ज्यादा टाइम भी देते हैं तो इन सब से जो पोस्ट होती है वह बहुत कम हो जाती है इंडिया के इस रॉकेट रॉकेट मिशन के एस कंप्यूटर अदर बड़ी बड़ी कंपनी जैसे नासा हो गईTRUE Itna Sasta Rocket Mission Kaise Launch Karta Hai Uske Piche Kaisa Bhi Ho Jaye Main Aapko Batane Vala Hoon Pehla Hai Technology Adaptation Matlab Shuru Kya Karta Hai Ki Purani Technology Usko Use Karta Hai Apne Naye Mishans Mein Wahi Jo Dusri Badi Badi Company Se Nashta Ho Gayi Aur Bhi Kai Saree Hai Bolo Har Nayi Mission Ke Liye Nayi Technology Banane Ki Koshish Karti Hain Jisme Paise Ka Kharcha Bahut Zyada Hota Hai Pehla Diesel Aur Iska Example Yeh Hai Ki Apne SLV Ka Naam Suna Hua Satellite Launch Wahi Kar Iska Jo Engine Tha Unhone Use Kiya Apple Engine Mein Purane Engine Ko Use Kar Liya Ab Aap Sochie Ki Kitna Paisa Aur Kitni Technology Ka Paisa Isme Bachat Hua Sabse Bada Reason Ki Hai Agle 20 Din Mein Aapko Batata Hoon Ki Agla Reason Yeh Hai Ki Koi Bhi Badi Badi Company Se Hoti Hai Jo NASA Ho Gayi Bolo Kya Karte Hain Kisi Bhi Mission Ko Check Karne Ke Liye Uski Teen Physical Model Banate Hain Satellite Ke Aur Test Karte Hain Bhai Paison Ki Baat Karun Main Bahut Apna System Software Of Computer Ka Aur Unki Technology Iska Is Tarike Se Use Karta Hai Ki Wah Ek Final Model Banata Hai Aur Ussi Ko Seedhe Launch Kar Deta Hai Sochie Aur Sabse Zyada Paisa Isi Mein Kharch Hota Hai Other Company Iska Sirf 1 Physical Model Se Kaam Ho Jata Hai Wahi Udhar 333 Model Banaye Jaate Hain Kisne Start Kiya Tha Na Par Us Time Bharat Bahut Garibi Mein Tha To Unhone Bahut Mehnat Kari Aur Unhone Jis Tarike Se Mehnat Kari Aapko Jante Ki Kab Kaise Kya Karna Hai Jisse Ki Money Aur Time Dono Save Ho Sake Aur Saath Hi Saath Bharat Ke Log Zyada Time Dete Hain Is Mission Mein Aur Saath Ke Saath Bharat Ki Jo Labour Cost Hai Wah Kafi Kam Hai Aur Zyada Time Bhi Dete Hain To In Sab Se Jo Post Hoti Hai Wah Bahut Kam Ho Jati Hai India Ke Is Rocket Rocket Mission Ke S Computer Other Badi Badi Company Jaise NASA Ho Gayi
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय बेंगलुरू कर्नाटक में है।इसकी स्थापना 15 अगस्त 1969 मे हुई इसके संस्थापक: विक्रम अंबालाल साराभाई है संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है!!!
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय बेंगलुरू कर्नाटक में है।इसकी स्थापना 15 अगस्त 1969 मे हुई इसके संस्थापक: विक्रम अंबालाल साराभाई है संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है!!!Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Bharat Ka Rashtriya Antariksh Sansthan Hai Jiska Mukhyalay Bengaluru Karnataka Mein Hai Iski Sthapana 15 August 1969 Me Hui Iske Sansthapak Vikram Ambalal Sarabhai Hai Sansthan Mein Lagbhag Satrah Hazar Karmchari Evam Vaigyanik Karyarat Hain Sansthan Ka Mukhya Karya Bharat Ke Liye Antariksh Sambadhi Takneek Uplabdha Karwana Hai
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इसरो की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय बेंगलुरू कर्नाटक में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है।
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इसरो की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय बेंगलुरू कर्नाटक में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। Isro Ki Sthapana 15 August 1969 Ko Hui Thi Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Bharat Ka Rashtriya Antariksh Sansthan Hai Jiska Mukhyalay Bengaluru Karnataka Mein Hai Sansthan Mein Lagbhag Satrah Hazar Karmchari Evam Vaigyanik Karyarat Hain Sansthan Ka Mukhya Karya Bharat Ke Liye Antariksh Sambadhi Takneek Uplabdha Karwana Hai
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय कर्नाटक प्रान्त की राजधानी बेंगालुरू में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों मेंउपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है। इसरो के वर्तमान निदेशक ए एस किरण कुमार हैं। आज भारत न सिर्फ अपने अंतरिक्ष संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है बल्कि दुनिया के बहुत से देशों को अपनी अंतरिक्ष क्षमता से व्यापारिक और अन्य स्तरों पर सहयोग कर रहा है। इसरो वर्तमान में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पी.एस.एल.वी.) एवं भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जी.एस.एल.वी.) की सहायता से क्रमश: कृत्रिम एवं भू-स्थायी कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपित करता है। इसरो को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए साल 2014 के इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के लगभग एक वर्ष बाद इसने 29 सितंबर 2015 को एस्ट्रोसैट के रूप में भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला स्थापित किया। जून 2016 तक इसरो लगभग 20 अलग-अलग देशों के 57 उपग्रहों को लॉन्च कर चुका है, और इसके द्वारा उसने अब तक 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर कमाए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान का इतिहास भारत का अंतरिक्षीय अनुभव बहुत पुराना है, जब रॉकेट को आतिशबाजी के रूप में पहली बार प्रयोग में लाया गया, जो की पडौसी देश चीन का तकनीकी आविष्कार था और तब दोनों देशों में रेशम मार्ग से विचारों एवं वस्तुओं का आदान प्रदान हुआ करता था। जब टीपू सुल्तान द्वारा मैसूर युद्ध में अंग्रेजों को खधेडने में रॉकेट के प्रयोग को देखकर विलियम कंग्रीव प्रभावित हुआ, तो उसने 1805 में कंग्रीव रॉकेट का आविष्कार किया, जो की आज के आधुनिक तोपखानों की देन माना जाता है। 1947 में अंग्रेजों की बेडियों से मुक्त होने के बाद, भारतीय वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ भारत की रॉकेट तकनीक के सुरक्षा क्षेत्र में उपयोग, एवं अनुसंधान एवं विकास की संभाव्यता की वजह से विख्यात हुए। भारत जनसांख्यिकीय दृष्टि से विशाल होने की वजह से, दूरसंचार के क्षेत्र में कृत्रिम उपग्रहों की प्रार्थमिक संभाव्यता को देखते हुए, भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना की गई। 1960-1970 sarabhai, विक्रम साराभाई विक्रम साराभाई भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम डॉ विक्रम साराभाई की संकल्पना है, जिन्हें भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा गया है। वे वैज्ञानिक कल्पना एवं राष्ट्र-नायक के रूप में जाने गए। 1957 में स्पूतनिक के प्रक्षेपण के बाद, उन्होंने कृत्रिम उपग्रहों की उपयोगिता को भांपा । भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू, जिन्होंने भारत के भविष्य में वैज्ञानिक विकास को अहम् भाग माना, 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान को परमाणु ऊर्जा विभाग की देखरेख में रखा। परमाणु उर्जा विभाग के निदेशक होमी भाभा, जो कि भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं,1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति (इनकोस्पार) का गठन किया, जिसमें डॉ॰ साराभाई को सभापति के रूप में नियुक्त किया जापान और यूरोप को छोड़कर, हर मुख्य अंतरिक्ष कार्यक्रम कि तरह, भारत ने अपने विदित सैनिक प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम को सक्षम कराने में लगाने के बजाय, कृत्रिम उपग्रहों को प्रक्षेपण में समर्थ बनाने के उद्धेश्य हेतु किया। 1962 में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की स्थापना के साथ ही, इसने अनुसंधित रॉकेट का प्रक्षेपण शुरू कर दिया, जिसमें भूमध्य रेखा की समीपता वरदान साबित हुई। ये सभी नव-स्थापित थुंबा भू-मध्यीय रॉकेट अनुसंधान केन्द्र से प्रक्षेपित किए गए, जो कि दक्षिण केरल में तिरुवंतपुरम के समीप स्थित है। शुरुआत में, अमेरिका एवं फ्रांस के अनुसंधित रॉकेट क्रमश: नाइक अपाचे एवं केंटोर की तरह, उपरी दबाव का अध्ययन करने के लिए प्रक्षेपित किए गए, जब तक कि प्रशांत महासागर में पोत-आधारित अनुसंधित रॉकेट से अध्ययन शुरू न हुआ। ये इंग्लैंड और रूस की तर्ज पर बनाये गये। फिर भी पहले दिन से ही, अंतरिक्ष कार्यक्रम की विकासशील देशी तकनीक की उच्च महत्वाकांक्षा थी और इसके चलते भारत ने ठोस इंधन का प्रयोग करके अपने अनुसंधित रॉकेट का निर्माण शुरू कर दिया, जिसे रोहिणी की संज्ञा दी गई। भारत अंतरिक्ष कार्यक्रम ने देशी तकनीक की आवश्यकता, एवं कच्चे माल एवं तकनीक आपूर्ति में भावी अस्थिरता की संभावना को भांपते हुए, प्रत्येक माल आपूर्ति मार्ग, प्रक्रिया एवं तकनीक को अपने अधिकार में लाने का प्रयत्न किया। जैसे जैसे भारतीय रोहिणी कार्यक्रम ने और अधिक संकुल एवं वृहताकार रोकेट का प्रक्षेपण जारी रखा, अंतरिक्ष कार्यक्रम बढ़ता चला गया और इसे परमाणु उर्जा विभाग से विभाजित कर, अपना अलग ही सरकारी विभाग दे दिया गया। परमाणु उर्जा विभाग के अंतर्गत इन्कोस्पार कार्यक्रम से 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन किया गया, जो कि प्रारम्भ में अंतरिक्ष मिशन के अंतर्गत कार्यरत था और परिणामस्वरूप जून, 1972 में, अंतरिक्ष विभाग की स्थापना की गई। कल : साइकल पर राकेट लेजाते इसरो के वैज्ञानिक, बैलगाड़ी पर एप्पल उपग्रह ढोते इसरो के वैज्ञानिक आज : इसरो का राकेट लेजाने वाला वाहन PSLV के साथ कल : साइकल पर राकेट लेजाते इसरो के वैज्ञानिक, बैलगाड़ी पर एप्पल उपग्रह ढोते इसरो के वैज्ञानिक आज : इसरो का राकेट लेजाने वाला वाहन PSLV के साथ 1970-1980 भारत के वाहक-राकेट : बायें से दायें - एसएलवी, एएसएलवी, पीएसएलवी, जीएसएलवी, जीएसएलवी मार्क III भारत के वाहक-राकेट : बायें से दायें – एसएलवी, एएसएलवी, पीएसएलवी, जीएसएलवी, जीएसएलवी मार्क III 1960 के दशक में डॉ॰ साराभाई ने टेलीविजन के सीधे प्रसारण के जैसे बहुल अनुप्रयोगों के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले कृत्रिम उपग्रहों की सम्भव्यता के सन्दर्भ में नासा के साथ प्रारंभिक अध्ययन में हिस्सा लिया और अध्ययन से यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि, प्रसारण के लिए यही सबसे सस्ता और सरल साधन है। शुरुआत से ही, उपग्रहों को भारत में लाने के फायदों को ध्यान में रखकर, साराभाई और इसरो ने मिलकर एक स्वतंत्र प्रक्षेपण वाहन का निर्माण किया, जो कि कृत्रिम उपग्रहों को कक्ष में स्थापित करने, एवं भविष्य में वृहत प्रक्षेपण वाहनों में निर्माण के लिए आवश्यक अभ्यास उपलब्ध कराने में सक्षम था। रोहिणी श्रेणी के साथ ठोस मोटर बनाने में भारत की क्षमता को परखते हुए, अन्य देशो ने भी समांतर कार्यक्रमों के लिए ठोस रॉकेट का उपयोग बेहतर समझा और इसरो ने कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (एस.एल.वी.) की आधारभूत संरचना एवं तकनीक का निर्माण प्रारम्भ कर दिया। अमेरिका के स्काउट रॉकेट से प्रभावित होकर, वाहन को चतुर्स्तरीय ठोस वाहन का रूप दिया गया। इस दौरान, भारत ने भविष्य में संचार की आवश्यकता एवं दूरसंचार का पूर्वानुमान लगते हुए, उपग्रह के लिए तकनीक का विकास प्रारम्भ कर दिया। भारत की अंतरिक्ष में प्रथम यात्रा 1975 में रूस के सहयोग से इसके कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण से शुरू हुयी। 1979 तक, नव-स्थापित द्वितीय प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से एस.एल.वी. प्रक्षेपण के लिए तैयार हो चुका था। द्वितीय स्तरीय असफलता की वजह से इसका 1979 में प्रथम प्रक्षेपण सफल नहीं हो पाया था। 1980 तक इस समस्या का निवारण कर लिया गया। भारत का देश में प्रथम निर्मित कृत्रिम उपग्रह रोहिणी-प्रथम प्रक्षेपित किया गया। अमरीकी प्रतिबंध सोवियत संघ के साथ भारत के बूस्टर तकनीक के क्षेत्र में सहयोग का अमरीका द्वारा परमाणु अप्रसार नीति की आड़ में काफी प्रतिरोध किया गया। 1992 में भारतीय संस्था इसरो और सोवियत संस्था ग्लावकास्मोस पर प्रतिबंध की धमकी दी गयी। इन धमकियों की वजह से सोवियत संघ ने इस सहयोग से अपना हाथ पीछे खींच लिया सोवियत संघ क्रायोजेनिक द्रव राकेट इंजन तो भारत को देने के लिये तैयार था लेकिन इसके निर्माण से जुड़ी तकनीक देने को तैयार नही हुआ जो भारत सोवियत संघ से खरीदना चाहता था। इस असहयोग का परिणाम यह हुआ कि भारत अमरीकी प्रतिबंधों का सामना करते हुये भी सोवियत संघ से बेहतर स्वदेशी तकनीक दो सालो के अथक शोध के बाद विकसित कर ली। 5 जनवरी 2014 को, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान की डी5 उड़ान में किया। प्रमुख अभियान चंद्रयान चन्द्रयान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के एक अभियान व यान का नाम है। चंद्रयान चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान है। इस अभियान के अन्तर्गत एक मानवरहित यान को 22 अक्टूबर, 2008 को चन्द्रमा पर भेजा गया और यह 30 अगस्त, 2009 तक सक्रिय रहा। यह यान पोलर सेटलाईट लांच वेहिकल (पी एस एल वी) के एक परिवर्तित संस्करण वाले राकेट की सहायता से सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ‘इसरो’ के चार चरणों वाले 316 टन वजनी और 44.4 मीटर लंबा अंतरिक्ष यान चंद्रयान प्रथम के साथ ही 11 और उपकरण एपीएसएलवी-सी11 से प्रक्षेपित किए गए जिनमें से पाँच भारत के हैं और छह अमरीका और यूरोपीय देशों के। इसे चन्द्रमा तक पहुँचने में 5 दिन लगें पर चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित करने में 15 दिनों का समय लगा। चंद्रयान का उद्देश्य चंद्रमा की सतह के विस्तृत नक्शे और पानी के अंश और हीलियम की तलाश करना था। चंद्रयान-प्रथम ने चंद्रमा से 100 किमी ऊपर 525 किग्रा का एक उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया। यह उपग्रह अपने रिमोट सेंसिंग (दूर संवेदी) उपकरणों के जरिये चंद्रमा की ऊपरी सतह के चित्र भेजे। भारतीय अंतरिक्षयान प्रक्षेपण के अनुक्रम में यह २७वाँ उपक्रम है। इसका कार्यकाल लगभग 2 साल का होना था, मगर नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटने के कारण इसे उससे पहले बंद कर दिया गया। चन्द्रयान के साथ भारत चाँद को यान भेजने वाला छठा देश बन गया था। इस उपक्रम से चन्द्रमा और मंगल ग्रह पर मानव-सहित विमान भेजने के लिये रास्ता खुला। मंगलयान इसके साथ ही भारत भी अब उन देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने मंगल पर अपने यान भेजे हैं। वैसे अब तक मंगल को जानने के लिये शुरू किये गये दो तिहाई अभियान असफल भी रहे हैं परन्तु 24 सितंबर 2014 को मंगल पर पहुँचने के साथ ही भारत विश्व में अपने प्रथम प्रयास में ही सफल होने वाला पहला देश तथा सोवियत रूस, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद दुनिया का चौथा देश बन गया है। इसके अतिरिक्त ये मंगल पर भेजा गया सबसे सस्ता मिशन भी है । भारत एशिया का भी ऐसा करने वाला प्रथम पहला देश बन गया। क्योंकि इससे पहले चीन और जापान अपने मंगल अभियान में असफल रहे थे। वस्तुतः यह एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन परियोजना है जिसका लक्ष्य अन्तरग्रहीय अन्तरिक्ष मिशनों के लिये आवश्यक डिजाइन, नियोजन, प्रबन्धन तथा क्रियान्वयन का विकास करना है। ऑर्बिटर अपने पांच उपकरणों के साथ मंगल की परिक्रमा करता रहेगा तथा वैज्ञानिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आंकड़े व तस्वीरें पृथ्वी पर भेजेगा। अंतरिक्ष यान पर वर्तमान में इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क (इस्ट्रैक),बंगलौर के अंतरिक्षयान नियंत्रण केंद्र से भारतीय डीप स्पेस नेटवर्क एंटीना की सहायता से नजर रखी जा रही है प्रतिष्ठित ‘टाइम’ पत्रिका ने मंगलयान को 2014 के सर्वश्रेष्ठ आविष्कारों में शामिल किया। स्क्रेमजेट परंपरागत रॉकेट इंजन जहां ईंधन और ऑक्सिडाइजर दोनों लेकर जाते हैं, वहीं स्‍क्रेमजेट इंजन ‘एयर ब्रीदिंग प्रोपल्‍सन सिस्‍टम’ के चलते सुपरसोनिक स्‍पीड के दौरान वातावरण में मौजूद ऑक्‍सीजन को खींच लेता है। इसके चलते यह ऑक्‍सीजन ईंधन को जलाने के लिए ऑक्‍सीडाइजर का काम करेगा। इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया था कि स्‍क्रेमजेट इंजन को 55 सैकंड के लिए टेस्‍ट किया जाएगा। पहला हिस्‍सा अलग होकर बंगाल की खाड़ी में गिरने के बाद भी रॉकेट ऊपर जाता रहेगा। दूसरी स्‍टेज में रॉकेट जब ध्‍वनि की रफ्तार से छह गुनी गति से जाएगा तो स्‍क्रेमजेट इंजन 20 किमी की ऊंचाई पर शुरू हो जाएगा। इसके बाद पांच सैकंड तक ईंधन जलेगा। फिर रॉकेट 40-70 किमी ऊपर जाने के बाद समुद्र में गिर जाएगा। स्‍क्रेमजेट इंजन के चलते यान का वजन भी लगभग आधा हो जाएगा। हाइपरसोनिक गति से जाने वाले राकेट के लिए यह इंजन उपयुक्‍त है। रविवार के टेस्‍ट के बाद इस इंजन को फुल स्‍केल आरएलवी में इस्‍तेमाल किया जाएगा। जापान, चीन, रूस और यूरोपीय संघ सुपरसोनिक कॉमबस्‍टर तकनीक के टेस्टिंग चरण में हैं। वहीं नासा ने 2004 में स्‍क्रेमजेट इंजन का प्रदर्शन किया था। इसरो ने भी साल 2006 में स्‍क्रेमजेट का ग्राउंड टेस्‍ट किया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्‍थान(इसरो) ने अगस्त 2016 मे स्‍क्रेमजेट इंजन का टेस्‍ट किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अनुसंधान केंद्र से सुबह छह बजे तीन टन वजन के RH-560 सुपरसोनिक कम्‍बशन रैमजेट ने उड़ान भरी। इसमें लगाया गया इंजन एडवांस्‍ड टेक्‍नोलॉजी से लैस है और इसकी मदद से भारत सैटेलाइट प्रक्षेपण के खर्च में कमी कर पाएगा। इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया कि यह इंजन रियूजेबल लॉन्‍च व्‍हीकल को हायरपासोनिक स्‍पीड पर उपयोग करने में मदद देगा। टेस्‍ट के दौरान स्‍क्रेमजेट इंजन को 1970 में तैयार किए गए RH-560 साउंड रॉकेट में लगाया गया। इसे 20 किलोमीटर ऊपर ले जाया गया और वहां पर पांच सैकंड तक ईंधन को जलने दिया गया। बाद में यह रॉकेट बंगाल की खाड़ी में गिर गया। पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV) RLVपुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान-प्रौद्योगिकी प्रदर्शन कार्यक्रम, रीयूज़ेबल लांच व्हीकल टेक्नोलॉजी डेमोंसट्रेटर प्रोग्राम, या RLV-TD, भारत का प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन है जो टू स्टेज टू ऑर्बिट (TSTO) को समझने व पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण वाहन की दिशा में पहले कदम के रूप में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा नियोजित प्रौद्योगिकी प्रदर्शन (टेक्नोलॉजी डीमॉन्सट्रेशन) की एक श्रृंखला है। इस प्रयोजन के लिए, एक पंख युक्त पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी प्रदर्शक (RLV-TD) बनाया गया। RLV-TD संचालित क्रूज उड़ान, हाइपरसॉनिक उड़ान, और स्वायत्त (ऑटोनॉमस) लैंडिंग, वायु श्वसन प्रणोदन (एयर ब्रीदिंग प्रपलशन) जैसे विभिन्न प्रौद्योगिकियों का मूल्यांकन करने के रूप में कार्य करेगा । इन प्रौद्योगिकियों के प्रयोग से लांच लागत में काफी कमी आएगी। वर्तमान में ऐसे स्पेस शटल बनाने वाले देशों में सिर्फ़ अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान हैं। चीन ने इस प्रकार का कोई प्रयास नहीं किया है प्रमुख राकेट पी एस एल वी ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान या पी.एस.एल.वी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा संचालित एक उपभोजित प्रक्षेपण प्रणाली है। भारत ने इसे अपने सुदूर संवेदी उपग्रह को सूर्य समकालिक कक्षा में प्रक्षेपित करने के लिये विकसित किया है। पीएसएलवी के विकास से पूर्व यह सुविधा केवल रूस के पास थी। पीएसएलवी छोटे आकार के उपग्रहों को भू-स्थिर कक्षा में भी भेजने में सक्षम है। अब तक पीएसएलवी की सहायता से 70 अन्तरिक्षयान (30 भारतीय + 40 अन्तरराष्ट्रीय) विभिन्न कक्षाओं में प्रक्षेपित किये जा चुके हैं। इससे इस की विश्वसनीयता एवं विविध कार्य करने की क्षमता सिद्ध हो चुकी है। 22 जून, 2016 में इस यान ने अपनी क्षमता की चरम सीमा को छुआ जब पीएसएलवी सी-34 के माध्यम से रिकॉर्ड २० उपग्रह एक साथ छोड़े गए। इससे पहले 28 अप्रैल 2008 को इसरो ने एक साथ 10 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर एक ही बार में सबसे ज़्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने का विश्वरिकॉर्ड बनाया था। जी एस एल वी भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (अंग्रेज़ी:जियोस्टेशनरी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, लघु: जी.एस.एल.वी) अंतरिक्ष में उपग्रह के प्रक्षेपण में सहायक यान है। ये यान उपग्रह को पृथ्वी की भूस्थिर कक्षा में स्थापित करने में मदद करता है। जीएसएलवी ऐसा बहुचरण रॉकेट होता है जो दो टन से अधिक भार के उपग्रह को पृथ्वी से 36000 कि॰मी॰ की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा की सीध में होता है। ये रॉकेट अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इनके तीसरे यानी अंतिम चरण में सबसे अधिक बल की आवश्यकता होती है। रॉकेट की यह आवश्यकता केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बिना क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट का निर्माण मुश्किल होता है। अधिकतर काम के उपग्रह दो टन से अधिक के ही होते हैं। इसलिए विश्व भर में छोड़े जाने वाले 50 प्रतिशत उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर निश्चित कि॰मी॰ की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है। यही इसकी की प्रमुख विशेषता है। भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान एम.के. 3 (GSLV MK3 को लॉन्च वाहन मार्क 3 (LVM 3) भी कहा जाता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित एक प्रक्षेपण वाहन है। इसको भू-स्थिर कक्षा में उपग्रहों और भारतीय अंतरिक्ष यात्री को प्रक्षेपित करने के लिये विकसित किया गया है। जीएसएलवी-III में एक भारतीय क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन की तीसरे चरण में सुविधा है। और वर्तमान भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान की तुलना में अधिक पेलोड ले जाने क्षमता है।
Romanized Version
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय कर्नाटक प्रान्त की राजधानी बेंगालुरू में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों मेंउपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है। इसरो के वर्तमान निदेशक ए एस किरण कुमार हैं। आज भारत न सिर्फ अपने अंतरिक्ष संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है बल्कि दुनिया के बहुत से देशों को अपनी अंतरिक्ष क्षमता से व्यापारिक और अन्य स्तरों पर सहयोग कर रहा है। इसरो वर्तमान में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पी.एस.एल.वी.) एवं भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जी.एस.एल.वी.) की सहायता से क्रमश: कृत्रिम एवं भू-स्थायी कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपित करता है। इसरो को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए साल 2014 के इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के लगभग एक वर्ष बाद इसने 29 सितंबर 2015 को एस्ट्रोसैट के रूप में भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला स्थापित किया। जून 2016 तक इसरो लगभग 20 अलग-अलग देशों के 57 उपग्रहों को लॉन्च कर चुका है, और इसके द्वारा उसने अब तक 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर कमाए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान का इतिहास भारत का अंतरिक्षीय अनुभव बहुत पुराना है, जब रॉकेट को आतिशबाजी के रूप में पहली बार प्रयोग में लाया गया, जो की पडौसी देश चीन का तकनीकी आविष्कार था और तब दोनों देशों में रेशम मार्ग से विचारों एवं वस्तुओं का आदान प्रदान हुआ करता था। जब टीपू सुल्तान द्वारा मैसूर युद्ध में अंग्रेजों को खधेडने में रॉकेट के प्रयोग को देखकर विलियम कंग्रीव प्रभावित हुआ, तो उसने 1805 में कंग्रीव रॉकेट का आविष्कार किया, जो की आज के आधुनिक तोपखानों की देन माना जाता है। 1947 में अंग्रेजों की बेडियों से मुक्त होने के बाद, भारतीय वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ भारत की रॉकेट तकनीक के सुरक्षा क्षेत्र में उपयोग, एवं अनुसंधान एवं विकास की संभाव्यता की वजह से विख्यात हुए। भारत जनसांख्यिकीय दृष्टि से विशाल होने की वजह से, दूरसंचार के क्षेत्र में कृत्रिम उपग्रहों की प्रार्थमिक संभाव्यता को देखते हुए, भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना की गई। 1960-1970 sarabhai, विक्रम साराभाई विक्रम साराभाई भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम डॉ विक्रम साराभाई की संकल्पना है, जिन्हें भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा गया है। वे वैज्ञानिक कल्पना एवं राष्ट्र-नायक के रूप में जाने गए। 1957 में स्पूतनिक के प्रक्षेपण के बाद, उन्होंने कृत्रिम उपग्रहों की उपयोगिता को भांपा । भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू, जिन्होंने भारत के भविष्य में वैज्ञानिक विकास को अहम् भाग माना, 1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान को परमाणु ऊर्जा विभाग की देखरेख में रखा। परमाणु उर्जा विभाग के निदेशक होमी भाभा, जो कि भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं,1962 में अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति (इनकोस्पार) का गठन किया, जिसमें डॉ॰ साराभाई को सभापति के रूप में नियुक्त किया जापान और यूरोप को छोड़कर, हर मुख्य अंतरिक्ष कार्यक्रम कि तरह, भारत ने अपने विदित सैनिक प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम को सक्षम कराने में लगाने के बजाय, कृत्रिम उपग्रहों को प्रक्षेपण में समर्थ बनाने के उद्धेश्य हेतु किया। 1962 में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की स्थापना के साथ ही, इसने अनुसंधित रॉकेट का प्रक्षेपण शुरू कर दिया, जिसमें भूमध्य रेखा की समीपता वरदान साबित हुई। ये सभी नव-स्थापित थुंबा भू-मध्यीय रॉकेट अनुसंधान केन्द्र से प्रक्षेपित किए गए, जो कि दक्षिण केरल में तिरुवंतपुरम के समीप स्थित है। शुरुआत में, अमेरिका एवं फ्रांस के अनुसंधित रॉकेट क्रमश: नाइक अपाचे एवं केंटोर की तरह, उपरी दबाव का अध्ययन करने के लिए प्रक्षेपित किए गए, जब तक कि प्रशांत महासागर में पोत-आधारित अनुसंधित रॉकेट से अध्ययन शुरू न हुआ। ये इंग्लैंड और रूस की तर्ज पर बनाये गये। फिर भी पहले दिन से ही, अंतरिक्ष कार्यक्रम की विकासशील देशी तकनीक की उच्च महत्वाकांक्षा थी और इसके चलते भारत ने ठोस इंधन का प्रयोग करके अपने अनुसंधित रॉकेट का निर्माण शुरू कर दिया, जिसे रोहिणी की संज्ञा दी गई। भारत अंतरिक्ष कार्यक्रम ने देशी तकनीक की आवश्यकता, एवं कच्चे माल एवं तकनीक आपूर्ति में भावी अस्थिरता की संभावना को भांपते हुए, प्रत्येक माल आपूर्ति मार्ग, प्रक्रिया एवं तकनीक को अपने अधिकार में लाने का प्रयत्न किया। जैसे जैसे भारतीय रोहिणी कार्यक्रम ने और अधिक संकुल एवं वृहताकार रोकेट का प्रक्षेपण जारी रखा, अंतरिक्ष कार्यक्रम बढ़ता चला गया और इसे परमाणु उर्जा विभाग से विभाजित कर, अपना अलग ही सरकारी विभाग दे दिया गया। परमाणु उर्जा विभाग के अंतर्गत इन्कोस्पार कार्यक्रम से 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का गठन किया गया, जो कि प्रारम्भ में अंतरिक्ष मिशन के अंतर्गत कार्यरत था और परिणामस्वरूप जून, 1972 में, अंतरिक्ष विभाग की स्थापना की गई। कल : साइकल पर राकेट लेजाते इसरो के वैज्ञानिक, बैलगाड़ी पर एप्पल उपग्रह ढोते इसरो के वैज्ञानिक आज : इसरो का राकेट लेजाने वाला वाहन PSLV के साथ कल : साइकल पर राकेट लेजाते इसरो के वैज्ञानिक, बैलगाड़ी पर एप्पल उपग्रह ढोते इसरो के वैज्ञानिक आज : इसरो का राकेट लेजाने वाला वाहन PSLV के साथ 1970-1980 भारत के वाहक-राकेट : बायें से दायें - एसएलवी, एएसएलवी, पीएसएलवी, जीएसएलवी, जीएसएलवी मार्क III भारत के वाहक-राकेट : बायें से दायें – एसएलवी, एएसएलवी, पीएसएलवी, जीएसएलवी, जीएसएलवी मार्क III 1960 के दशक में डॉ॰ साराभाई ने टेलीविजन के सीधे प्रसारण के जैसे बहुल अनुप्रयोगों के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले कृत्रिम उपग्रहों की सम्भव्यता के सन्दर्भ में नासा के साथ प्रारंभिक अध्ययन में हिस्सा लिया और अध्ययन से यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि, प्रसारण के लिए यही सबसे सस्ता और सरल साधन है। शुरुआत से ही, उपग्रहों को भारत में लाने के फायदों को ध्यान में रखकर, साराभाई और इसरो ने मिलकर एक स्वतंत्र प्रक्षेपण वाहन का निर्माण किया, जो कि कृत्रिम उपग्रहों को कक्ष में स्थापित करने, एवं भविष्य में वृहत प्रक्षेपण वाहनों में निर्माण के लिए आवश्यक अभ्यास उपलब्ध कराने में सक्षम था। रोहिणी श्रेणी के साथ ठोस मोटर बनाने में भारत की क्षमता को परखते हुए, अन्य देशो ने भी समांतर कार्यक्रमों के लिए ठोस रॉकेट का उपयोग बेहतर समझा और इसरो ने कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (एस.एल.वी.) की आधारभूत संरचना एवं तकनीक का निर्माण प्रारम्भ कर दिया। अमेरिका के स्काउट रॉकेट से प्रभावित होकर, वाहन को चतुर्स्तरीय ठोस वाहन का रूप दिया गया। इस दौरान, भारत ने भविष्य में संचार की आवश्यकता एवं दूरसंचार का पूर्वानुमान लगते हुए, उपग्रह के लिए तकनीक का विकास प्रारम्भ कर दिया। भारत की अंतरिक्ष में प्रथम यात्रा 1975 में रूस के सहयोग से इसके कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण से शुरू हुयी। 1979 तक, नव-स्थापित द्वितीय प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से एस.एल.वी. प्रक्षेपण के लिए तैयार हो चुका था। द्वितीय स्तरीय असफलता की वजह से इसका 1979 में प्रथम प्रक्षेपण सफल नहीं हो पाया था। 1980 तक इस समस्या का निवारण कर लिया गया। भारत का देश में प्रथम निर्मित कृत्रिम उपग्रह रोहिणी-प्रथम प्रक्षेपित किया गया। अमरीकी प्रतिबंध सोवियत संघ के साथ भारत के बूस्टर तकनीक के क्षेत्र में सहयोग का अमरीका द्वारा परमाणु अप्रसार नीति की आड़ में काफी प्रतिरोध किया गया। 1992 में भारतीय संस्था इसरो और सोवियत संस्था ग्लावकास्मोस पर प्रतिबंध की धमकी दी गयी। इन धमकियों की वजह से सोवियत संघ ने इस सहयोग से अपना हाथ पीछे खींच लिया सोवियत संघ क्रायोजेनिक द्रव राकेट इंजन तो भारत को देने के लिये तैयार था लेकिन इसके निर्माण से जुड़ी तकनीक देने को तैयार नही हुआ जो भारत सोवियत संघ से खरीदना चाहता था। इस असहयोग का परिणाम यह हुआ कि भारत अमरीकी प्रतिबंधों का सामना करते हुये भी सोवियत संघ से बेहतर स्वदेशी तकनीक दो सालो के अथक शोध के बाद विकसित कर ली। 5 जनवरी 2014 को, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान की डी5 उड़ान में किया। प्रमुख अभियान चंद्रयान चन्द्रयान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के एक अभियान व यान का नाम है। चंद्रयान चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान है। इस अभियान के अन्तर्गत एक मानवरहित यान को 22 अक्टूबर, 2008 को चन्द्रमा पर भेजा गया और यह 30 अगस्त, 2009 तक सक्रिय रहा। यह यान पोलर सेटलाईट लांच वेहिकल (पी एस एल वी) के एक परिवर्तित संस्करण वाले राकेट की सहायता से सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ‘इसरो’ के चार चरणों वाले 316 टन वजनी और 44.4 मीटर लंबा अंतरिक्ष यान चंद्रयान प्रथम के साथ ही 11 और उपकरण एपीएसएलवी-सी11 से प्रक्षेपित किए गए जिनमें से पाँच भारत के हैं और छह अमरीका और यूरोपीय देशों के। इसे चन्द्रमा तक पहुँचने में 5 दिन लगें पर चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित करने में 15 दिनों का समय लगा। चंद्रयान का उद्देश्य चंद्रमा की सतह के विस्तृत नक्शे और पानी के अंश और हीलियम की तलाश करना था। चंद्रयान-प्रथम ने चंद्रमा से 100 किमी ऊपर 525 किग्रा का एक उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया। यह उपग्रह अपने रिमोट सेंसिंग (दूर संवेदी) उपकरणों के जरिये चंद्रमा की ऊपरी सतह के चित्र भेजे। भारतीय अंतरिक्षयान प्रक्षेपण के अनुक्रम में यह २७वाँ उपक्रम है। इसका कार्यकाल लगभग 2 साल का होना था, मगर नियंत्रण कक्ष से संपर्क टूटने के कारण इसे उससे पहले बंद कर दिया गया। चन्द्रयान के साथ भारत चाँद को यान भेजने वाला छठा देश बन गया था। इस उपक्रम से चन्द्रमा और मंगल ग्रह पर मानव-सहित विमान भेजने के लिये रास्ता खुला। मंगलयान इसके साथ ही भारत भी अब उन देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने मंगल पर अपने यान भेजे हैं। वैसे अब तक मंगल को जानने के लिये शुरू किये गये दो तिहाई अभियान असफल भी रहे हैं परन्तु 24 सितंबर 2014 को मंगल पर पहुँचने के साथ ही भारत विश्व में अपने प्रथम प्रयास में ही सफल होने वाला पहला देश तथा सोवियत रूस, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद दुनिया का चौथा देश बन गया है। इसके अतिरिक्त ये मंगल पर भेजा गया सबसे सस्ता मिशन भी है । भारत एशिया का भी ऐसा करने वाला प्रथम पहला देश बन गया। क्योंकि इससे पहले चीन और जापान अपने मंगल अभियान में असफल रहे थे। वस्तुतः यह एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन परियोजना है जिसका लक्ष्य अन्तरग्रहीय अन्तरिक्ष मिशनों के लिये आवश्यक डिजाइन, नियोजन, प्रबन्धन तथा क्रियान्वयन का विकास करना है। ऑर्बिटर अपने पांच उपकरणों के साथ मंगल की परिक्रमा करता रहेगा तथा वैज्ञानिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आंकड़े व तस्वीरें पृथ्वी पर भेजेगा। अंतरिक्ष यान पर वर्तमान में इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क (इस्ट्रैक),बंगलौर के अंतरिक्षयान नियंत्रण केंद्र से भारतीय डीप स्पेस नेटवर्क एंटीना की सहायता से नजर रखी जा रही है प्रतिष्ठित ‘टाइम’ पत्रिका ने मंगलयान को 2014 के सर्वश्रेष्ठ आविष्कारों में शामिल किया। स्क्रेमजेट परंपरागत रॉकेट इंजन जहां ईंधन और ऑक्सिडाइजर दोनों लेकर जाते हैं, वहीं स्‍क्रेमजेट इंजन ‘एयर ब्रीदिंग प्रोपल्‍सन सिस्‍टम’ के चलते सुपरसोनिक स्‍पीड के दौरान वातावरण में मौजूद ऑक्‍सीजन को खींच लेता है। इसके चलते यह ऑक्‍सीजन ईंधन को जलाने के लिए ऑक्‍सीडाइजर का काम करेगा। इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया था कि स्‍क्रेमजेट इंजन को 55 सैकंड के लिए टेस्‍ट किया जाएगा। पहला हिस्‍सा अलग होकर बंगाल की खाड़ी में गिरने के बाद भी रॉकेट ऊपर जाता रहेगा। दूसरी स्‍टेज में रॉकेट जब ध्‍वनि की रफ्तार से छह गुनी गति से जाएगा तो स्‍क्रेमजेट इंजन 20 किमी की ऊंचाई पर शुरू हो जाएगा। इसके बाद पांच सैकंड तक ईंधन जलेगा। फिर रॉकेट 40-70 किमी ऊपर जाने के बाद समुद्र में गिर जाएगा। स्‍क्रेमजेट इंजन के चलते यान का वजन भी लगभग आधा हो जाएगा। हाइपरसोनिक गति से जाने वाले राकेट के लिए यह इंजन उपयुक्‍त है। रविवार के टेस्‍ट के बाद इस इंजन को फुल स्‍केल आरएलवी में इस्‍तेमाल किया जाएगा। जापान, चीन, रूस और यूरोपीय संघ सुपरसोनिक कॉमबस्‍टर तकनीक के टेस्टिंग चरण में हैं। वहीं नासा ने 2004 में स्‍क्रेमजेट इंजन का प्रदर्शन किया था। इसरो ने भी साल 2006 में स्‍क्रेमजेट का ग्राउंड टेस्‍ट किया था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्‍थान(इसरो) ने अगस्त 2016 मे स्‍क्रेमजेट इंजन का टेस्‍ट किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अनुसंधान केंद्र से सुबह छह बजे तीन टन वजन के RH-560 सुपरसोनिक कम्‍बशन रैमजेट ने उड़ान भरी। इसमें लगाया गया इंजन एडवांस्‍ड टेक्‍नोलॉजी से लैस है और इसकी मदद से भारत सैटेलाइट प्रक्षेपण के खर्च में कमी कर पाएगा। इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया कि यह इंजन रियूजेबल लॉन्‍च व्‍हीकल को हायरपासोनिक स्‍पीड पर उपयोग करने में मदद देगा। टेस्‍ट के दौरान स्‍क्रेमजेट इंजन को 1970 में तैयार किए गए RH-560 साउंड रॉकेट में लगाया गया। इसे 20 किलोमीटर ऊपर ले जाया गया और वहां पर पांच सैकंड तक ईंधन को जलने दिया गया। बाद में यह रॉकेट बंगाल की खाड़ी में गिर गया। पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV) RLVपुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान-प्रौद्योगिकी प्रदर्शन कार्यक्रम, रीयूज़ेबल लांच व्हीकल टेक्नोलॉजी डेमोंसट्रेटर प्रोग्राम, या RLV-TD, भारत का प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन है जो टू स्टेज टू ऑर्बिट (TSTO) को समझने व पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण वाहन की दिशा में पहले कदम के रूप में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा नियोजित प्रौद्योगिकी प्रदर्शन (टेक्नोलॉजी डीमॉन्सट्रेशन) की एक श्रृंखला है। इस प्रयोजन के लिए, एक पंख युक्त पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी प्रदर्शक (RLV-TD) बनाया गया। RLV-TD संचालित क्रूज उड़ान, हाइपरसॉनिक उड़ान, और स्वायत्त (ऑटोनॉमस) लैंडिंग, वायु श्वसन प्रणोदन (एयर ब्रीदिंग प्रपलशन) जैसे विभिन्न प्रौद्योगिकियों का मूल्यांकन करने के रूप में कार्य करेगा । इन प्रौद्योगिकियों के प्रयोग से लांच लागत में काफी कमी आएगी। वर्तमान में ऐसे स्पेस शटल बनाने वाले देशों में सिर्फ़ अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान हैं। चीन ने इस प्रकार का कोई प्रयास नहीं किया है प्रमुख राकेट पी एस एल वी ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान या पी.एस.एल.वी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा संचालित एक उपभोजित प्रक्षेपण प्रणाली है। भारत ने इसे अपने सुदूर संवेदी उपग्रह को सूर्य समकालिक कक्षा में प्रक्षेपित करने के लिये विकसित किया है। पीएसएलवी के विकास से पूर्व यह सुविधा केवल रूस के पास थी। पीएसएलवी छोटे आकार के उपग्रहों को भू-स्थिर कक्षा में भी भेजने में सक्षम है। अब तक पीएसएलवी की सहायता से 70 अन्तरिक्षयान (30 भारतीय + 40 अन्तरराष्ट्रीय) विभिन्न कक्षाओं में प्रक्षेपित किये जा चुके हैं। इससे इस की विश्वसनीयता एवं विविध कार्य करने की क्षमता सिद्ध हो चुकी है। 22 जून, 2016 में इस यान ने अपनी क्षमता की चरम सीमा को छुआ जब पीएसएलवी सी-34 के माध्यम से रिकॉर्ड २० उपग्रह एक साथ छोड़े गए। इससे पहले 28 अप्रैल 2008 को इसरो ने एक साथ 10 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर एक ही बार में सबसे ज़्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने का विश्वरिकॉर्ड बनाया था। जी एस एल वी भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (अंग्रेज़ी:जियोस्टेशनरी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, लघु: जी.एस.एल.वी) अंतरिक्ष में उपग्रह के प्रक्षेपण में सहायक यान है। ये यान उपग्रह को पृथ्वी की भूस्थिर कक्षा में स्थापित करने में मदद करता है। जीएसएलवी ऐसा बहुचरण रॉकेट होता है जो दो टन से अधिक भार के उपग्रह को पृथ्वी से 36000 कि॰मी॰ की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है जो विषुवत वृत्त या भूमध्य रेखा की सीध में होता है। ये रॉकेट अपना कार्य तीन चरण में पूरा करते हैं। इनके तीसरे यानी अंतिम चरण में सबसे अधिक बल की आवश्यकता होती है। रॉकेट की यह आवश्यकता केवल क्रायोजेनिक इंजन ही पूरा कर सकते हैं। इसलिए बिना क्रायोजेनिक इंजन के जीएसएलवी रॉकेट का निर्माण मुश्किल होता है। अधिकतर काम के उपग्रह दो टन से अधिक के ही होते हैं। इसलिए विश्व भर में छोड़े जाने वाले 50 प्रतिशत उपग्रह इसी वर्ग में आते हैं। जीएसएलवी रॉकेट इस भार वर्ग के दो तीन उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में ले जाकर निश्चित कि॰मी॰ की ऊंचाई पर भू-स्थिर कक्षा में स्थापित कर देता है। यही इसकी की प्रमुख विशेषता है। भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान एम.के. 3 (GSLV MK3 को लॉन्च वाहन मार्क 3 (LVM 3) भी कहा जाता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित एक प्रक्षेपण वाहन है। इसको भू-स्थिर कक्षा में उपग्रहों और भारतीय अंतरिक्ष यात्री को प्रक्षेपित करने के लिये विकसित किया गया है। जीएसएलवी-III में एक भारतीय क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन की तीसरे चरण में सुविधा है। और वर्तमान भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान की तुलना में अधिक पेलोड ले जाने क्षमता है।Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Isro Bharat Ka Rashtriya Antariksh Sansthan Hai Jiska Mukhyalay Karnataka Parant Ki Rajdhani Mein Hai Sansthan Mein Lagbhag Hazar Karmchari Evam Vaigyanik Karyarat Hain Sansthan Ka Mukhya Karya Bharat Ke Liye Antariksh Takneek Uplabdha Karwana Hai Antariksh Karyakram Ke Mukhya Udyeshwo Aur Bhu Pranaleeyon Ka Vikash Shamil Hai Isro Ke Vartaman Nideshak A S Kiran Kumar Hain Aaj Bharat N Sirf Apne Antariksh Sambandhi Avashayaktao Ki Purti Karne Mein Saksham Hai Balki Duniya Ke Bahut Se Deshon Ko Apni Antariksh Kshamta Se Vyaparik Aur Anya Staron Par Sahyog Kar Raha Hai Isro Vartaman Mein Dharuvia Upgrah Prakshepan Yaan P S El V Evam Bhusthira Upgrah Prakshepan Yaan Ji S El V Ki Sahaayata Se Kramash Krutrim Evam Bhu Sthayi Krutrim Upgrah Prashepit Karta Hai Isro Ko Shanti Nishastrikaran Aur Vikash Ke Liye Saal 2014 Ke Indira Gandhi Puraskaar Se Sammanit Kiya Gaya Mangalyaan Ke Safal Prakshepan Ke Lagbhag Ek Varsh Baad Isane 29 September 2015 Ko Ke Roop Mein Bharat Ki Pehli Antariksh Vedhshala Sthapit Kiya June 2016 Tak Isro Lagbhag 20 Alag Alag Deshon Ke 57 Upgraho Ko Launch Kar Chuka Hai Aur Iske Dwara Usne Ab Tak 10 Crore American Dollar Kamaye Hain Bhartiya Antariksh Anusandhan Ka Itihas Bharat Ka Anubhav Bahut Purana Hai Jab Rocket Ko Aatishabaji Ke Roop Mein Pehli Bar Prayog Mein Laya Gaya Jo Ki Desh Chin Ka Takniki Avishkar Tha Aur Tab Dono Deshon Mein Resham Marg Se Vicharon Evam Vastuon Ka Aadan Pradan Hua Karta Tha Jab Tipu Sultan Dwara Maisoor Yudh Mein Angrejo Ko Mein Rocket Ke Prayog Ko Dekhkar William Prabhavit Hua To Usne 1805 Mein Rocket Ka Avishkar Kiya Jo Ki Aaj Ke Aadhunik Ki Then Mana Jata Hai 1947 Mein Angrejo Ki Se Mukt Hone Ke Baad Bhartiya Vaigyanik Aur Rajanitigya Bharat Ki Rocket Takneek Ke Suraksha Kshetra Mein Upyog Evam Anusandhan Evam Vikash Ki Sambhavyata Ki Wajah Se Vikhyat Huye Bharat Jansankhiyakiya Drishti Se Vishal Hone Ki Wajah Se Doorsanchar Ke Kshetra Mein Krutrim Upgraho Ki Sambhavyata Ko Dekhte Huye Bharat Mein Antariksh Anusandhan Sangathan Ki Sthapana Ki Gayi Vikram Sarabhai Vikram Sarabhai Bhartiya Antariksh Karyakram Dr Vikram Sarabhai Ki Sankalpana Hai Jinhen Bhartiya Antariksh Karyakram Ka Janak Kaha Gaya Hai Ve Vaigyanik Kalpana Evam Rashtra Nayak Ke Roop Mein Jaane Gaye 1957 Mein Ke Prakshepan Ke Baad Unhone Krutrim Upgraho Ki Upayogita Ko Bharat Ke Pratham Pradhan Mantri Jawahar Lal Nehru Jinhone Bharat Ke Bhavishya Mein Vaigyanik Vikash Ko Aham Bhag Mana 1962 Mein Antariksh Anusandhan Ko Parmanu Urja Vibhag Ki Dekharekh Mein Rakha Parmanu Urja Vibhag Ke Nideshak Homi Bhabha Jo Ki Bhartiya Parmanu Karyakram Ke Janak Mane Jaate Hain Mein Antariksh Anusandhan Ke Liye Bhartiya Rashtriya Samiti Ka Gathan Kiya Jisme Sarabhai Ko Sabhapati Ke Roop Mein Niyukt Kiya Japan Aur Europe Ko Chodkar Har Mukhya Antariksh Karyakram Ki Tarah Bharat Ne Apne Widit Sainik Prakshepastra Karyakram Ko Saksham Karane Mein Lagane Ke Bajay Krutrim Upgraho Ko Prakshepan Mein Samarth Banane Ke Hetu Kiya 1962 Mein Bhartiya Antariksh Karyakram Ki Sthapana Ke Saath Hi Isane Rocket Ka Prakshepan Shuru Kar Diya Jisme Bhumadhya Rekha Ki Vardan Saabit Hui Yeh Sabhi Nav Sthapit Bhu Rocket Anusandhan Kendra Se Prashepit Kiye Gaye Jo Ki Dakshin Kerala Mein Ke Sameep Sthit Hai Shuruvat Mein America Evam France Ke Rocket Kramash Naik Apache Evam Ki Tarah Upari Dabaav Ka Adhyayan Karne Ke Liye Prashepit Kiye Gaye Jab Tak Ki Prashant Mahasagar Mein Pot Aadharit Rocket Se Adhyayan Shuru N Hua Yeh England Aur Rus Ki Tarj Par Banaye Gaye Phir Bhi Pehle Din Se Hi Antariksh Karyakram Ki Vikasshil Deshi Takneek Ki Uccha Thi Aur Iske Chalte Bharat Ne Thos Indhan Ka Prayog Karke Apne Rocket Ka Nirman Shuru Kar Diya Jise Ki Sangya Di Gayi Bharat Antariksh Karyakram Ne Deshi Takneek Ki Avashyakta Evam Kacche Maal Evam Takneek Aapurti Mein Bhavi Asthirata Ki Sambhavna Ko Huye Pratyek Maal Aapurti Marg Prakriya Evam Takneek Ko Apne Adhikaar Mein Lane Ka Prayatn Kiya Jaise Jaise Bhartiya Karyakram Ne Aur Adhik Evam Ka Prakshepan Jaari Rakha Antariksh Karyakram Badhta Chala Gaya Aur Ise Parmanu Urja Vibhag Se Vibhajit Kar Apna Alag Hi Sarkari Vibhag De Diya Gaya Parmanu Urja Vibhag Ke Antargat Karyakram Se 1969 Mein Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Ka Gathan Kiya Gaya Jo Ki Prarambh Mein Antariksh Mission Ke Antargat Karyarat Tha Aur Parinaamasvaroop June 1972 Mein Antariksh Vibhag Ki Sthapana Ki Gayi Kal : Cycle Par Raaket Isro Ke Vaigyanik Par Apple Upgrah Isro Ke Vaigyanik Aaj : Isro Ka Raaket Lejane Wala Vaahan PSLV Ke Saath Kal : Cycle Par Raaket Isro Ke Vaigyanik Par Apple Upgrah Isro Ke Vaigyanik Aaj : Isro Ka Raaket Lejane Wala Vaahan PSLV Ke Saath Bharat Ke Vahak Raaket : Se - PSLV Mark Bharat Ke Vahak Raaket : Se – PSLV Mark III 1960 Ke Dashak Mein Sarabhai Ne Television Ke Seedhe Prasaran Ke Jaise Bahul Anuprayogon Ke Liye Prayog Mein Laye Jaane Wale Krutrim Upgraho Ki Ke Sandarbh Mein Nasa Ke Saath Prarambhik Adhyayan Mein Hissa Liya Aur Adhyayan Se Yeh Gyaan Prapt Hua Ki Prasaran Ke Liye Yahi Sabse Sasta Aur Saral Sadhan Hai Shuruvat Se Hi Upgraho Ko Bharat Mein Lane Ke Fayadain Ko Dhyan Mein Rakhakar Sarabhai Aur Isro Ne Milkar Ek Swatantra Prakshepan Vaahan Ka Nirman Kiya Jo Ki Krutrim Upgraho Ko Kaksh Mein Sthapit Karne Evam Bhavishya Mein Vrihat Prakshepan Vahanon Mein Nirman Ke Liye Aavashyak Abhyas Uplabdha Karane Mein Saksham Tha Shrenee Ke Saath Thos Motor Banane Mein Bharat Ki Kshamta Ko Huye Anya Desho Ne Bhi Samantar 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Niti Ki Mein Kafi Pratirodh Kiya Gaya 1992 Mein Bhartiya Sanstha Isro Aur Soviet Sanstha Par Pratibandh Ki Dhamki Di Gayi In Dhamkiyo Ki Wajah Se Soviet Sangh Ne Is Sahyog Se Apna Hath Piche Khinch Liya Soviet Sangh Cryogenic Drav Raaket Engine To Bharat Ko Dene Ke Liye Taiyaar Tha Lekin Iske Nirman Se Judi Takneek Dene Ko Taiyaar Nahi Hua Jo Bharat Soviet Sangh Se Kharidna Chahta Tha Is Asahayog Ka Parinam Yeh Hua Ki Bharat Amariki Pratibandho Ka Samana Karte Hue Bhi Soviet Sangh Se Behtar Swadeshi Takneek Do Saalo Ke Athak Shodh Ke Baad Viksit Kar Lee 5 January 2014 Ko Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Ne Swadeshi Cryogenic Engine Ka Safal Parikshan Bhusthira Upgrah Prakshepan Yaan Ki D Uddan Mein Kiya Pramukh Abhiyan Chandrayan Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Ke Ek Abhiyan V Yaan Ka Naam Hai Chandrayan Chandrama Ki Taraf Kuch Karne Wala Bharat Ka Pehla Antariksh Yaan Hai Is Abhiyan Ke Antargat Ek Manavrahit Yaan Ko 22 October 2008 Ko Chandrama Par Bheja Gaya Aur Yeh 30 August 2009 Tak Sakriy Raha Yeh Yaan Polar Launch Vehicle P S El V Ke Ek Parivartit Sanskaran Wale Raaket Ki Sahaayata Se Satish Dhavan Antariksh Kendra Se Prashepit Kiya Gaya Bhartiya Antariksh Anusandhan Kendra Isro Ke Char Charanon Wale 316 Ton Vajani Aur 44.4 Meter Lamba Antariksh Yaan Chandrayan Pratham Ke Saath Hi 11 Aur Upkaran Si Se Prashepit Kiye Gaye Jinmein Se Panch Bharat Ke Hain Aur Cheh America Aur European Deshon Ke Ise Chandrama Tak Phuchane Mein 5 Din Lagein Par Chandrama Ki Kaksha Mein Sthapit Karne Mein 15 Dinon Ka Samay Laga Chandrayan Ka Uddeshya Chandrama Ki Satah Ke Vistrit Nakshe Aur Pani Ke Ansh Aur Helium Ki Talash Karna Tha Chandrayan Pratham Ne Chandrama Se 100 Kimi Upar 525 Kigra Ka Ek Upgrah Dharuvia Kaksha Mein Sthapit Kiya Yeh Upgrah Apne Remote Sensing Dur Sanvedi Upkarano Ke Jariye Chandrama Ki Upari Satah Ke Chitra Bheje Bhartiya Prakshepan Ke Mein Yeh Upakram Hai Iska Karyakal Lagbhag 2 Saal Ka Hona Tha Magar Niyantran Kaksh Se Sampark Tutane Ke Kaaran Ise Usse Pehle Band Kar Diya Gaya Ke Saath Bharat Chand Ko Yaan Bhejne Wala Chhatha Desh Ban Gaya Tha Is Upakram Se Chandrama Aur Mangal Grah Par Manav Sahit Viman Bhejne Ke Liye Rasta Khula Mangalyaan Iske Saath Hi Bharat Bhi Ab Un Deshon Mein Shamil Ho Gaya Hai Jinhone Mangal Par Apne Yaan Bheje Hain Waise Ab Tak Mangal Ko Jaanne Ke Liye Shuru Kiye Gaye Do Tihai Abhiyan Asafal Bhi Rahe Hain Parantu 24 September 2014 Ko Mangal Par Phuchane Ke Saath Hi Bharat Vishwa Mein Apne Pratham Prayas Mein Hi Safal Hone Wala Pehla Desh Tatha Soviet Rus Nasa Aur European Antariksh Agency Ke Baad Duniya Ka Chautha Desh Ban Gaya Hai Iske Atirikt Yeh Mangal Par Bheja Gaya Sabse Sasta Mission Bhi Hai Bharat Asia Ka Bhi Aisa Karne Wala Pratham Pehla Desh Ban Gaya Kyonki Isse Pehle Chin Aur Japan Apne Mangal Abhiyan Mein Asafal Rahe The Vastutah Yeh Ek Praudyogiki Pradarshan Pariyojana Hai Jiska Lakshya Antariksh Ke Liye Aavashyak Design Niyojan Prabandhan Tatha Kriyanwayan Ka Vikash Karna Hai 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Jaane Ke Baad Samudra Mein Gir Jayega Sa Engine Ke Chalte Yaan Ka Wajan Bhi Lagbhag Aadha Ho Jayega Hypersonic Gati Se Jaane Wale Raaket Ke Liye Yeh Engine Ta Hai Raviwar Ke Ke Baad Is Engine Ko Full Sa Kell Mein Is Kiya Jayega Japan Chin Rus Aur European Sangh Supersonic Tar Takneek Ke Testing Charan Mein Hain Wahin Nasa Ne 2004 Mein Sa Engine Ka Pradarshan Kiya Tha Isro Ne Bhi Saal 2006 Mein Sa Ka Ground Kiya Tha Bhartiya Antariksh Anusandhan Sthaan Isro Ne August 2016 Me Sa Engine Ka Kiya Andhra Pradesh Ke Shreeharikota Ke Satish Dhavan Anusandhan Kendra Se Subah Cheh Baje Teen Ton Wajan Ke RH-560 Supersonic Kam Ramjet Ne Uddan Bhari Isme Lagaya Gaya Engine Da Se Lase Hai Aur Iski Madad Se Bharat Satellite Prakshepan Ke Kharch Mein Kami Kar Payega Isro Ke Vaigyaanikon Ne Bataya Ki Yeh Engine Ch V Ko Sa Par Upyog Karne Mein Madad Dega Ke Dauran Sa Engine Ko 1970 Mein Taiyaar Kiye Gaye RH-560 Sound Rocket Mein Lagaya Gaya Ise 20 Kilometre Upar Le Jaaya Gaya Aur Wahan Par Paanch Tak 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P S El V Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Dwara Sanchalit Ek Prakshepan Pranali Hai Bharat Ne Ise Apne Sudoor Sanvedi Upgrah Ko Surya Samakaalik Kaksha Mein Prashepit Karne Ke Liye Viksit Kiya Hai PSLV Ke Vikash Se Purv Yeh Suvidha Kewal Rus Ke Paas Thi PSLV Chote Aakaar Ke Upgraho Ko Bhu Sthir Kaksha Mein Bhi Bhejne Mein Saksham Hai Ab Tak PSLV Ki Sahaayata Se 70 (30 Bhartiya + 40 Vibhinn Kakshaon Mein Prashepit Kiye Ja Chuke Hain Isse Is Ki Visvasaniyata Evam Vividh Karya Karne Ki Kshamta Siddh Ho Chuki Hai June 2016 Mein Is Yaan Ne Apni Kshamta Ki Charam Seema Ko Chhua Jab PSLV Si Ke Maadhyam Se Record 20 Upgrah Ek Saath Chodde Gaye Isse Pehle 28 April 2008 Ko Isro Ne Ek Saath 10 Upgraho Ko Antariksh Mein Ek Hi Bar Mein Sabse Jyada Upgrah Antariksh Mein Bhejne Ka Banaya Tha Ji S El V Bhusthira Upgrah Prakshepan Yaan Angrezi Satellite Launch Vehicle Laghu Ji S El V Antariksh Mein Upgrah Ke Prakshepan Mein Sahaayak Yaan Hai Yeh Yaan Upgrah Ko Prithvi Ki Bhusthira Kaksha Mein Sthapit Karne Mein Madad Karta Hai Aisa Rocket Hota Hai Jo Do Ton Se Adhik Bhar Ke Upgrah Ko Prithvi Se 36000 Ki Unchai Par Bhu Sthir Kaksha Mein Sthapit Kar Deta Hai Jo Vishuvat Vritt Ya Bhumadhya Rekha Ki Mein Hota Hai Yeh Rocket Apna Karya Teen Charan Mein Pura Karte Hain Inke Tisare Yani Antim Charan Mein Sabse Adhik Bal Ki Avashyakta Hoti Hai Rocket Ki Yeh Avashyakta Kewal Cryogenic Engine Hi Pura Kar Sakte Hain Isliye Bina Cryogenic Engine Ke Rocket Ka Nirman Mushkil Hota Hai Adhiktar Kaam Ke Upgrah Do Ton Se Adhik Ke Hi Hote Hain Isliye Vishwa Bhar Mein Chodde Jaane Wale 50 Pratishat Upgrah Isi Varg Mein Aate Hain Rocket Is Bhar Varg Ke Do Teen Upgraho Ko Ek Saath Antariksh Mein Le Jaakar Nishchit Ki Unchai Par Bhu Sthir Kaksha Mein Sthapit Kar Deta Hai Yahi Iski Ki Pramukh Visheshata Hai Bhusthira Upgrah Prakshepan Yaan Em Ke 3 (GSLV MK3 Ko Launch Vaahan Mark 3 (LVM 3) Bhi Kaha Jata Hai Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Isro Dwara Viksit Ek Prakshepan Vaahan Hai Isko Bhu Sthir Kaksha Mein Upgraho Aur Bhartiya Antariksh Yatri Ko Prashepit Karne Ke Liye Viksit Kiya Gaya Hai Mein Ek Bhartiya Cryogenic Rocket Engine Ki Tisare Charan Mein Suvidha Hai Aur Vartaman Bhusthira Upgrah Prakshepan Yaan Ki Tulna Mein Adhik Le Jaane Kshamta Hai
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इसरो में आपको अगर जॉब पाना है तो बहुत सारी चीजें होती हैं जिसकी आप पढ़ाई कर सकते हैं आप या तो एयरोनॉटिकल इंजीनियर हैं तो आप इस रूम में जा सकते हैं वहां पर फ्लाइट और जिसके पेट में इन्फेक्शन के लिए एरोन...
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इसरो में आपको अगर जॉब पाना है तो बहुत सारी चीजें होती हैं जिसकी आप पढ़ाई कर सकते हैं आप या तो एयरोनॉटिकल इंजीनियर हैं तो आप इस रूम में जा सकते हैं वहां पर फ्लाइट और जिसके पेट में इन्फेक्शन के लिए एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग अपने पड़ी है पड़ी है तो आप उस में जा सकते हैं अगर आप डेटा डेटा साइंटिस्ट है तो आप उस में जा सकते हैं या फिर आप एस्ट्रोनॉट कि आपने पढ़ाई की है तो फिर जा सकते हैं लेकिन नासा में जाने इतना आसान नहीं है क्योंकि इतना सा कोई हमारे इंडिया के अंदर नहीं है क्या आप वाकई में जा सकते हैं इंटरव्यू के लिए जा सकते हैं अगर आप कुछ भी बहुत ज्यादा एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी करते हैं उसके बाद अप्लाई करते हैं यहां से अपनी क्वालिफिकेशन के साथ तो आपको वहां पर जॉब लग सकती हैIsro Mein Aapko Agar Job Pana Hai To Bahut Saree Cheezen Hoti Hain Jiski Aap Padhai Kar Sakte Hain Aap Ya To Aeronautical Engineer Hain To Aap Is Room Mein Ja Sakte Hain Wahan Par Flight Aur Jiske Pet Mein Infection Ke Liye Eronatikal Engineering Apne Padi Hai Padi Hai To Aap Us Mein Ja Sakte Hain Agar Aap Data Data Scientist Hai To Aap Us Mein Ja Sakte Hain Ya Phir Aap Astronaut Ki Aapne Padhai Ki Hai To Phir Ja Sakte Hain Lekin Nasa Mein Jaane Itna Aasan Nahi Hai Kyonki Itna Sa Koi Hamare India Ke Andar Nahi Hai Kya Aap Vaakai Mein Ja Sakte Hain Interview Ke Liye Ja Sakte Hain Agar Aap Kuch Bhi Bahut Jyada Extra Ardinari Karte Hain Uske Baad Apply Karte Hain Yahan Se Apni Qualification Ke Saath To Aapko Wahan Par Job Lag Sakti Hai
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन,भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय बेंगलुरू कर्नाटक में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन,भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय बेंगलुरू कर्नाटक में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिये अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Bharat Ka Rashtriya Antariksh Sansthan Hai Jiska Mukhyalay Bengaluru Karnataka Mein Hai Sansthan Mein Lagbhag Satrah Hazar Karmchari Evam Vaigyanik Karyarat Hain Sansthan Ka Mukhya Karya Bharat Ke Liye Antariksh Sambadhi Takneek Uplabdha Karwana Hai Antariksh Karyakram Ke Mukhya Udyeshwo Mein Upgraho Pramochak Yano Parigyapi Raketon Aur Bhu Pranaleeyon Ka Vikash Shamil Hai
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इसरो और डीआरडीओ दोनों ही भारतीय कंपनी या संगठन है, आइये जानते हैं इन दोनों संगठन के बारे में- डीआरडीओ की स्थापना 1958 में हुई थी। उस समय यह एक छोटा सा संगठन था, जिसके अंतर्गत 10 प्रयोगशाला काम करती थी, लेकिन आज इसका काफी विस्तार हो चुका है। आकंडों के मुताबिक डीआरडीओ के पास 50 से अधिक लेबोरेटरीज हैं और 7,500 से अधिक वैज्ञानिक कार्यरत हैं। इसका मुख्य कार्य भारत के डिफेंस सिस्टम को आत्मनिर्भर बनाना है। डीआरडीओ आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की जरूरत के मुताबिक, हथियारों और उपकरणों की डिजाइनिंग, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन का कार्य करती है। इसके तहत एयरोनॉटिकल, कॉम्बैट वेहिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग सिस्टम, मिसाइल, मैटेरियल्स, नेवल सिस्टम, एडवांस्ड कम्प्यूटिंग, लाइफ साइंस आदि शामिल हैं। इसरो भारत सरकार द्वारा 'स्पेस कमीशन' और 'डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस' की शुरुआत जून 1972 में हुई। इसरो 1975 में आर्यभट्ट की शुरुआत के बाद अब तक कई कम्युनिकेशन और रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट लॉन्च कर चुका हैं। चंद्रयान-1 की सफल लॉन्चिंग के बाद अब 2016-17 में चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग के अलावा, एस्ट्रोसैट, जीसैट-6 ऐंड 6ए, जीसैट-9, जीसैट-11, जीसैट-15, जीसैट-16, आदित्या-1 की तैयारी भी चल रही है। इसरो का कार्य वेहिकल्स लॉन्चिंग, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, चूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम, कम्युनिकेशन सैटेलाइट, सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन सिस्टम आदि डेवलप करना है। इसरो और डीआडीओ दोनों ही संगठन अपनी जगह बेहतर हैं, क्योंकि इन दोनों ही देश के हित के लिये काम कर रहे हैं। इसलिये यह कह पाना मुश्किल है कि कौन एक दूसरे से ज्यादा अच्छा है।
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इसरो और डीआरडीओ दोनों ही भारतीय कंपनी या संगठन है, आइये जानते हैं इन दोनों संगठन के बारे में- डीआरडीओ की स्थापना 1958 में हुई थी। उस समय यह एक छोटा सा संगठन था, जिसके अंतर्गत 10 प्रयोगशाला काम करती थी, लेकिन आज इसका काफी विस्तार हो चुका है। आकंडों के मुताबिक डीआरडीओ के पास 50 से अधिक लेबोरेटरीज हैं और 7,500 से अधिक वैज्ञानिक कार्यरत हैं। इसका मुख्य कार्य भारत के डिफेंस सिस्टम को आत्मनिर्भर बनाना है। डीआरडीओ आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की जरूरत के मुताबिक, हथियारों और उपकरणों की डिजाइनिंग, डेवलपमेंट और प्रोडक्शन का कार्य करती है। इसके तहत एयरोनॉटिकल, कॉम्बैट वेहिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग सिस्टम, मिसाइल, मैटेरियल्स, नेवल सिस्टम, एडवांस्ड कम्प्यूटिंग, लाइफ साइंस आदि शामिल हैं। इसरो भारत सरकार द्वारा 'स्पेस कमीशन' और 'डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस' की शुरुआत जून 1972 में हुई। इसरो 1975 में आर्यभट्ट की शुरुआत के बाद अब तक कई कम्युनिकेशन और रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट लॉन्च कर चुका हैं। चंद्रयान-1 की सफल लॉन्चिंग के बाद अब 2016-17 में चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग के अलावा, एस्ट्रोसैट, जीसैट-6 ऐंड 6ए, जीसैट-9, जीसैट-11, जीसैट-15, जीसैट-16, आदित्या-1 की तैयारी भी चल रही है। इसरो का कार्य वेहिकल्स लॉन्चिंग, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, चूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम, कम्युनिकेशन सैटेलाइट, सैटेलाइट बेस्ड नेविगेशन सिस्टम आदि डेवलप करना है। इसरो और डीआडीओ दोनों ही संगठन अपनी जगह बेहतर हैं, क्योंकि इन दोनों ही देश के हित के लिये काम कर रहे हैं। इसलिये यह कह पाना मुश्किल है कि कौन एक दूसरे से ज्यादा अच्छा है।Isro Aur DRDO Dono Hi Bhartiya Company Ya Sangathan Hai Aaiye Jante Hain In Dono Sangathan Ke Bare Mein DRDO Ki Sthapana 1958 Mein Hui Thi Us Samay Yeh Ek Chota Sa Sangathan Tha Jiske Antargat 10 Prayogshala Kaam Karti Thi Lekin Aaj Iska Kafi Vistar Ho Chuka Hai Akandon Ke Mutabik DRDO Ke Paas 50 Se Adhik Leboretrij Hain Aur 7,500 Se Adhik Vaigyanik Karyarat Hain Iska Mukhya Karya Bharat Ke Defence System Ko Aatmanirbhar Banana Hai DRDO Army Navy Aur Airforce Ki Zaroorat Ke Mutabik Hathiyaron Aur Upkarano Ki Designing Development Aur Production Ka Karya Karti Hai Iske Tahat Aeronautical Combat Vehikals Electronics Instrumentation Engineering System Missile Materials Neval System Advanced Computering Life Science Aadi Shamil Hain Isro Bharat Sarkar Dwara Space Commision Aur Department Of Space Ki Shuruvat June 1972 Mein Hui Isro 1975 Mein Aryabhatta Ki Shuruvat Ke Baad Ab Tak Kai Communication Aur Remote Sensing Satellite Launch Kar Chuka Hain Chandrayan Ki Safal Launching Ke Baad Ab 2016-17 Mein Chandrayan Ki Launching Ke Alava Estrosait GSAT And A GSAT GSAT GSAT GSAT Athitya Ki Taiyari Bhi Chal Rahi Hai Isro Ka Karya Vehikals Launching Advanced Technology Chuman Spaceflight Program Communication Satellite Satellite Based Navigation System Aadi Develop Karna Hai Isro Aur Diaadio Dono Hi Sangathan Apni Jagah Behtar Hain Kyonki In Dono Hi Desh Ke Hit Ke Liye Kaam Kar Rahe Hain Isaliya Yeh Keh Pana Mushkil Hai Ki Kaun Ek Dusre Se Jyada Accha Hai
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इसराे के अन्तर्गत आदित्य एक अंतरिक्ष यान है जिसका मिशन सूर्य का अध्ययन करना है, और इसका वजन लगभग 400 किलोग्राम होगा। यह दृश्य और निकट आईआर बैंड में सौर कोरोना का अध्ययन करने वाला पहला भारतीय आधारित सौर कोरोनोग्राफ है। 2012 में उच्च सौर गतिविधि अवधि के दौरान आदित्य मिशन का शुभारंभ किया गया था, लेकिन निर्माण और अन्य तकनीकी पहलुओं में शामिल व्यापक कार्यों के कारण 2015 में 2015 को स्थगित कर दिया गया था।
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इसराे के अन्तर्गत आदित्य एक अंतरिक्ष यान है जिसका मिशन सूर्य का अध्ययन करना है, और इसका वजन लगभग 400 किलोग्राम होगा। यह दृश्य और निकट आईआर बैंड में सौर कोरोना का अध्ययन करने वाला पहला भारतीय आधारित सौर कोरोनोग्राफ है। 2012 में उच्च सौर गतिविधि अवधि के दौरान आदित्य मिशन का शुभारंभ किया गया था, लेकिन निर्माण और अन्य तकनीकी पहलुओं में शामिल व्यापक कार्यों के कारण 2015 में 2015 को स्थगित कर दिया गया था।Isaro Ke Antargat Aditya Ek Antariksh Yaan Hai Jiska Mission Surya Ka Adhyayan Karna Hai Aur Iska Wajan Lagbhag 400 Kilogram Hoga Yeh Drishya Aur Nikat IR Band Mein Sour Corona Ka Adhyayan Karne Wala Pehla Bhartiya Aadharit Sour Koronograf Hai 2012 Mein Uccha Sour Gatividhi Avadhi Ke Dauran Aditya Mission Ka Shubharambh Kiya Gaya Tha Lekin Nirman Aur Anya Takniki Pahaluon Mein Shamil Vyapak Kaaryon Ke Kaaran 2015 Mein 2015 Ko Sthagit Kar Diya Gaya Tha
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इसरो यानी की भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की सफलता का सबसे बड़ा कारण है, उनकी पूरी टीम जो कि हर तरह से इस संगठन को सफल बनाने के लिये प्रयत्न करती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि इसरो ने अपने सबसे भारी प्रपेक्षण वाहन जी. एस. एल. वी एम के 3 का सफलता पूर्वक प्रपेक्षण किया है। इसरो के शुरुआती दौर की बात करे तो उस समय इसरो संस्था के पास ऐसे संसाधन नहीं थे, जो उनकी मदद कर सके वहां कम करे लोगों ने अपने शुरुआती दौर में बहुत संघर्ष किया। एक समय ऐसा था कि जब बैलगाडी पर राकेट को रखकर लान्च के लिये ले जाया जाता था। लेकिन अब इसरो संस्था इस ऊंचाई तक पहुंच चुकी है कि विश्व भर में इसरो का नाम है। और इस संस्था ने कई रिकार्ड भी बनाये है। जिस वजह से यह सफल मानी गयी है आइये जानते हैं ऐसे ही कुछ रिकार्ड के बारे में- इसरो ने बनाया विश्व रिकॉर्ड, एक साथ 104 सैटेलाइट भेजे पीसीएलवी- इसरो ने 1990 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) को विकसित किया था, 1993 में इस यान से पहला उपग्रह ऑर्बिट में भेजा गया। चंद्रयान 2008 में इसरो ने चंद्रयान बनाकर विज्ञान की दुनिया में इतिहास रच दिया, 22 अक्टूबर 2008 को स्वदेश निर्मित इस मानव रहित अंतरिक्ष यान को चांद पर भेजा गया था। मंगलयान - भारतीय मंगलयान ने इसरो को दुनिया के नक्शे पर चमका दिया, मंगल तक पहुंचने में पहले प्रयास में सफल रहने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने 28 अप्रैल 2016 भारत का सातवां नेविगेशन उपग्रह (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) लॉन्च किया। इसरो की इतनी सारी उपलब्धियों की वजह से यह संगठन आज इतना सफल है।
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इसरो यानी की भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की सफलता का सबसे बड़ा कारण है, उनकी पूरी टीम जो कि हर तरह से इस संगठन को सफल बनाने के लिये प्रयत्न करती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि इसरो ने अपने सबसे भारी प्रपेक्षण वाहन जी. एस. एल. वी एम के 3 का सफलता पूर्वक प्रपेक्षण किया है। इसरो के शुरुआती दौर की बात करे तो उस समय इसरो संस्था के पास ऐसे संसाधन नहीं थे, जो उनकी मदद कर सके वहां कम करे लोगों ने अपने शुरुआती दौर में बहुत संघर्ष किया। एक समय ऐसा था कि जब बैलगाडी पर राकेट को रखकर लान्च के लिये ले जाया जाता था। लेकिन अब इसरो संस्था इस ऊंचाई तक पहुंच चुकी है कि विश्व भर में इसरो का नाम है। और इस संस्था ने कई रिकार्ड भी बनाये है। जिस वजह से यह सफल मानी गयी है आइये जानते हैं ऐसे ही कुछ रिकार्ड के बारे में- इसरो ने बनाया विश्व रिकॉर्ड, एक साथ 104 सैटेलाइट भेजे पीसीएलवी- इसरो ने 1990 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) को विकसित किया था, 1993 में इस यान से पहला उपग्रह ऑर्बिट में भेजा गया। चंद्रयान 2008 में इसरो ने चंद्रयान बनाकर विज्ञान की दुनिया में इतिहास रच दिया, 22 अक्टूबर 2008 को स्वदेश निर्मित इस मानव रहित अंतरिक्ष यान को चांद पर भेजा गया था। मंगलयान - भारतीय मंगलयान ने इसरो को दुनिया के नक्शे पर चमका दिया, मंगल तक पहुंचने में पहले प्रयास में सफल रहने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने 28 अप्रैल 2016 भारत का सातवां नेविगेशन उपग्रह (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) लॉन्च किया। इसरो की इतनी सारी उपलब्धियों की वजह से यह संगठन आज इतना सफल है। Isro Yani Ki Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Ki Safalta Ka Sabse Bada Kaaran Hai Unki Puri Team Jo Ki Har Tarah Se Is Sangathan Ko Safal Banane Ke Liye Prayatn Karti Hai Iska Sabse Bada Udaharan Hai Ki Isro Ne Apne Sabse Bhari Prapekshan Vaahan Ji S El V Em Ke 3 Ka Safalta Purvak Prapekshan Kiya Hai Isro Ke Suruaati Daur Ki Baat Kare To Us Samay Isro Sanstha Ke Paas Aise Sansadhan Nahi The Jo Unki Madad Kar Sake Wahan Kam Kare Logon Ne Apne Suruaati Daur Mein Bahut Sangharsh Kiya Ek Samay Aisa Tha Ki Jab Bailgadi Par Raaket Ko Rakhakar Launch Ke Liye Le Jaaya Jata Tha Lekin Ab Isro Sanstha Is Unchai Tak Pahunch Chuki Hai Ki Vishwa Bhar Mein Isro Ka Naam Hai Aur Is Sanstha Ne Kai Record Bhi Banaye Hai Jis Wajah Se Yeh Safal Maani Gayi Hai Aaiye Jante Hain Aise Hi Kuch Record Ke Bare Mein Isro Ne Banaya Vishwa Record Ek Saath 104 Satellite Bheje PCLV Isro Ne 1990 Mein Dharuvia Upgrah Prakshepan Yaan PSLV Ko Viksit Kiya Tha 1993 Mein Is Yaan Se Pehla Upgrah ORBIT Mein Bheja Gaya Chandrayan 2008 Mein Isro Ne Chandrayan Banakar Vigyan Ki Duniya Mein Itihas Rach Diya 22 October 2008 Ko Swadesh Nirmit Is Manav Rahit Antariksh Yaan Ko Chand Par Bheja Gaya Tha Mangalyaan - Bhartiya Mangalyaan Ne Isro Ko Duniya Ke Nakshe Par Chamka Diya Mangal Tak Pahuchne Mein Pehle Prayas Mein Safal Rehne Wala Bharat Duniya Ka Pehla Desh Bana Bhartiya Antariksh Anusandhan Sansthan Isro Ne 28 April 2016 Bharat Ka Satvaan Navigation Upgrah Indian Regional Navigation Satellite System Launch Kiya Isro Ki Itni Saree Uplabdhiyon Ki Wajah Se Yeh Sangathan Aaj Itna Safal Hai
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स्पेस पर जाना किसका सपना नहीं होता, एक बार तो हर इंसान अपनी जिंदगी में स्पेस में जाना चाहेगा। इसी क्रम में इसरो ने मंगलयान के बाद अंतरिक्ष में इंसान भेजने की तैयार कर ली है। इसकी शुरुआत करते हुए इसरो ने एक रॉकेट को तमिलनाडु के महेंद्रगिरि से श्रीहरिकोटा के अंतरिक्ष केंद्र में पहुंचा दिया है। इस मिशन की तैयार 2014 में की गयी थी, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रयोग के तौर पर किया गया है। इसमें अंतरिक्ष यात्रियों के बजाय साढ़े तीन टन का क्रू कैप्सूल भेजा जा सकता है, वापस इसे धरती पर पैराशूट की मदद से उतारा जाएगा। इस मिशन के लिए जीएसएलवी-मार्क 3 का इस्तेमाल करने की उम्मीद जताई गयी थी। इसकी कोर स्टेज का वजन 110 टन से अधिक है। इसे पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाने के बाद कई स्तरों पर परीक्षण किए जाएंगे। भारत एक अरसे से इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की कोशिश कर रहा है। इस मिशन से यही सबित होता है कि आने वाले कुछ सालो में इसरोअंतरिक्ष में इंसानो को भेज सकता है।
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स्पेस पर जाना किसका सपना नहीं होता, एक बार तो हर इंसान अपनी जिंदगी में स्पेस में जाना चाहेगा। इसी क्रम में इसरो ने मंगलयान के बाद अंतरिक्ष में इंसान भेजने की तैयार कर ली है। इसकी शुरुआत करते हुए इसरो ने एक रॉकेट को तमिलनाडु के महेंद्रगिरि से श्रीहरिकोटा के अंतरिक्ष केंद्र में पहुंचा दिया है। इस मिशन की तैयार 2014 में की गयी थी, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रयोग के तौर पर किया गया है। इसमें अंतरिक्ष यात्रियों के बजाय साढ़े तीन टन का क्रू कैप्सूल भेजा जा सकता है, वापस इसे धरती पर पैराशूट की मदद से उतारा जाएगा। इस मिशन के लिए जीएसएलवी-मार्क 3 का इस्तेमाल करने की उम्मीद जताई गयी थी। इसकी कोर स्टेज का वजन 110 टन से अधिक है। इसे पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाने के बाद कई स्तरों पर परीक्षण किए जाएंगे। भारत एक अरसे से इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की कोशिश कर रहा है। इस मिशन से यही सबित होता है कि आने वाले कुछ सालो में इसरोअंतरिक्ष में इंसानो को भेज सकता है।Space Par Jana Kiska Sapna Nahi Hota Ek Bar To Har Insaan Apni Zindagi Mein Space Mein Jana Chahega Isi Kram Mein Isro Ne Mangalyaan Ke Baad Antariksh Mein Insaan Bhejne Ki Taiyaar Kar Lee Hai Iski Shuruvat Karte Huye Isro Ne Ek Rocket Ko Tamil Nadu Ke Mahendragiri Se Shreeharikota Ke Antariksh Kendra Mein Pahuncha Diya Hai Is Mission Ki Taiyaar 2014 Mein Ki Gayi Thi Lekin Iska Istemal Prayog Ke Taur Par Kiya Gaya Hai Isme Antariksh Yatriyon Ke Bajay Sadhe Teen Ton Ka Crew Capsule Bheja Ja Sakta Hai Wapas Ise Dharti Par Parachute Ki Madad Se Utara Jayega Is Mission Ke Liye GSLV Mark 3 Ka Istemal Karne Ki Ummid Jatai Gayi Thi Iski Core Stage Ka Wajan 110 Ton Se Adhik Hai Ise Prithvi Ki Kaksha Mein Pahunchane Ke Baad Kai Staron Par Parikshan Kiye Jaenge Bharat Ek ARSHE Se Insaan Ko Antariksh Mein Bhejne Ki Koshish Kar Raha Hai Is Mission Se Yahi Sabit Hota Hai Ki Aane Wale Kuch Saalo Mein Isaroantariksh Mein Insaano Ko Bhej Sakta Hai
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आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 12 अप्रैल 2018 को सुबह 4 बजे से IRNSS-1I को फर्स्ट लॉन्च पैड (एफएलपी) PSLV-C41 के जरिए लॉन्च किया गया। आईआरएनएसएस-1I को आईआरएनएसएस-1एच सैटलाइट की जगह पर छोड़ा गया, जिसका लॉन्च असफल रहा था। लेकिन इसरो की इस स्वदेशी तकनीक पर निर्मित आईआरएनएसएस-1I सैटलाइट का सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। आईआरएनएसएस यानि इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटलाइट सिस्टम, इसरो द्वारा विकसित एक सिस्टम है, जो स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य देश और उसकी सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी के हिस्से में इसकी उपयोगकर्ता को सही जानकारी देना है। 5- IRNSS-1I इसरो की नाविक प्रणाली का हिस्सा होगा। यह सैटलाइट मैप तैयार करने, समय का बिल्कुल सही पता लगाने, नैविगेशन की पूरी जानकारी, समुद्री नैविगेशन के अलावा सैन्य क्षेत्र में भी सहायता करेगी
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आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 12 अप्रैल 2018 को सुबह 4 बजे से IRNSS-1I को फर्स्ट लॉन्च पैड (एफएलपी) PSLV-C41 के जरिए लॉन्च किया गया। आईआरएनएसएस-1I को आईआरएनएसएस-1एच सैटलाइट की जगह पर छोड़ा गया, जिसका लॉन्च असफल रहा था। लेकिन इसरो की इस स्वदेशी तकनीक पर निर्मित आईआरएनएसएस-1I सैटलाइट का सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। आईआरएनएसएस यानि इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटलाइट सिस्टम, इसरो द्वारा विकसित एक सिस्टम है, जो स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य देश और उसकी सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी के हिस्से में इसकी उपयोगकर्ता को सही जानकारी देना है। 5- IRNSS-1I इसरो की नाविक प्रणाली का हिस्सा होगा। यह सैटलाइट मैप तैयार करने, समय का बिल्कुल सही पता लगाने, नैविगेशन की पूरी जानकारी, समुद्री नैविगेशन के अलावा सैन्य क्षेत्र में भी सहायता करेगीAndhra Pradesh Ke Shreeharikota Mein Sthit Satish Dhavan Antariksh Kendra Se 12 April 2018 Ko Subah 4 Baje Se IRNSS-1I Ko First Launch Pad FLP PSLV-C41 Ke Jariye Launch Kiya Gaya IRNSS Ko IRNSS H Satellite Ki Jagah Par Choda Gaya Jiska Launch Asafal Raha Tha Lekin Isro Ki Is Swadeshi Takneek Par Nirmit IRNSS Satellite Ka Safaltaapurvak Launch Kiya Gaya Tha IRNSS Yani Indian Regional Navigation Satellite System Isro Dwara Viksit Ek System Hai Jo Swadeshi Takneek Par Aadharit Hai Iska Mukhya Uddeshya Desh Aur Uski Seema Se 1500 Kilometre Ki Doori Ke Hisse Mein Iski Upyogkartaa Ko Sahi Jankari Dena Hai 5- IRNSS-1I Isro Ki Navik Pranali Ka Hissa Hoga Yeh Satellite Map Taiyaar Karne Samay Ka Bilkul Sahi Pata Lagane Navigation Ki Puri Jankari Samudri Navigation Ke Alava Sainya Kshetra Mein Bhi Sahaayata Karegi
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श्रीहरिकोटा भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश के तट पर बसा एक द्वीप है। यह भारत का एकमात्र उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र जो सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान द्वारा प्रयोग किया जाता है जहां पर सेटलाइट को लान्च किया जाता है। इसके पीछे का कारण है कि यह जगह समुद्र के निकट है, साथ ही यह जगह भूमध्य रेखा के पास है। और यहां पर बहुत ईधन बचाया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में, इसरो ने 60 तकनीकी लॉन्च के अलावा अन्य उपग्रह भी लान्च किये हैं। और उपग्रह प्रेपक्षण के लिये यहां वह सारी सुविधायें उपलब्ध हैं जो इसके लिये जरुरी है।
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श्रीहरिकोटा भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश के तट पर बसा एक द्वीप है। यह भारत का एकमात्र उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र जो सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान द्वारा प्रयोग किया जाता है जहां पर सेटलाइट को लान्च किया जाता है। इसके पीछे का कारण है कि यह जगह समुद्र के निकट है, साथ ही यह जगह भूमध्य रेखा के पास है। और यहां पर बहुत ईधन बचाया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में, इसरो ने 60 तकनीकी लॉन्च के अलावा अन्य उपग्रह भी लान्च किये हैं। और उपग्रह प्रेपक्षण के लिये यहां वह सारी सुविधायें उपलब्ध हैं जो इसके लिये जरुरी है। Shreeharikota Bharat Ke Dakshini Rajya Andhra Pradesh Ke Tat Par Basa Ek Dweep Hai Yeh Bharat Ka Ekmatra Upgrah Prakshepan Kendra Jo Satish Dhavan Antariksh Kendra Mein Hai Jise Bhartiya Antariksh Anusandhan Dwara Prayog Kiya Jata Hai Jahan Par Setlight Ko Launch Kiya Jata Hai Iske Piche Ka Kaaran Hai Ki Yeh Jagah Samudra Ke Nikat Hai Saath Hi Yeh Jagah Bhumadhya Rekha Ke Paas Hai Aur Yahan Par Bahut Idhan Bachaya Ja Sakta Hai Pichhle Kuch Varshon Mein Isro Ne 60 Takniki Launch Ke Alava Anya Upgrah Bhi Launch Kiye Hain Aur Upgrah Prepakshan Ke Liye Yahan Wah Saree Suvidhayain Uplabdha Hain Jo Iske Liye Zaroori Hai
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1 9 6 9 में बनाया गया, इसरो ने 1 9 62 में स्वतंत्र वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के प्रयासों द्वारा स्थापित अंतरिक्ष अनुसंधान (आईएनसीएसपीएआरएआर) की पूर्व भारतीय राष्ट्रीय समिति को हटा दिया।
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1 9 6 9 में बनाया गया, इसरो ने 1 9 62 में स्वतंत्र वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के प्रयासों द्वारा स्थापित अंतरिक्ष अनुसंधान (आईएनसीएसपीएआरएआर) की पूर्व भारतीय राष्ट्रीय समिति को हटा दिया।1 9 6 9 Mein Banaya Gaya Isro Ne 1 9 62 Mein Swatantra Vaigyanik Vikram Sarabhai Ke Prayaso Dwara Sthapit Antariksh Anusandhan INCSPARAR Ki Purv Bhartiya Rashtriya Samiti Ko Hata Diya
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इसरो द्वारा हालिया सफल परियोजनाएं हैं इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) को कई वर्षों से लागत प्रभावी अंतरिक्ष मिशन के साथ आने के लिए जाना जाता है। मितव्ययी इंजीनियरिंग और अनुकूली तकनीक के लिए इसके नाटक ने इसरो को दुनिया में खड़ा कर दिया है। 1. मंगल ग्रह के मिशन के लिए पीएसएलवी सी 25 लॉन्च करें श्रीहरिकोटा: भारत ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर (इसरो) से पीएसएलवी सी 25 बोर्ड पर मंगल ग्रह के लिए अपना पहला मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया। मिशन 24 सितंबर, 2014 तक मंगल कक्षा तक पहुंचने की उम्मीद है। 2. श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर श्रीहरिकोटा: भारत ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर (इसरो) से पीएसएलवी सी 25 बोर्ड पर मंगल ग्रह के लिए अपना पहला मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया। मिशन 24 सितंबर, 2014 तक मंगल कक्षा तक पहुंचने की उम्मीद है। 3. पीएसएलवी सी 25 लॉन्च करें भारत ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर (इसरो) से पीएसएलवी सी 25 बोर्ड पर मंगल ग्रह पर अपना पहला मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया। मिशन 24 सितंबर, 2014 तक मंगल कक्षा तक पहुंचने की उम्मीद है। 4. भारत का पहला जीपीएस उपग्रह अंतरिक्ष आवेदन के एक नए युग में एक ऐतिहासिक यात्रा में, 1 जुलाई, 2013 को भारत ने ध्रुवीय उपग्रह लॉन्च वाहन का उपयोग करके अपना पहला समर्पित नेविगेशन उपग्रह सफलतापूर्वक लॉन्च किया जो सतीश धवन स्पेस सेंटर से विस्फोट हुआ।भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के लिए आईआरएनएसएस नामित, यह दुनिया के कुछ नेविगेशन सिस्टमों में से एक है और भारत के आसपास और आसपास नेविगेशन के लिए यूएस के स्वामित्व वाली जीपीएस (ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम) जैसी प्रणालियों का विकल्प प्रदान करेगा।आईआरएनएसएस में सात उपग्रह होते हैं, भूगर्भीय कक्षा में तीन और चार भूरे रंग के समेकित कक्षा में होते हैं, और मुख्य रूप से भारत के आसपास के क्षेत्र को कवर करेंगे।
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इसरो द्वारा हालिया सफल परियोजनाएं हैं इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) को कई वर्षों से लागत प्रभावी अंतरिक्ष मिशन के साथ आने के लिए जाना जाता है। मितव्ययी इंजीनियरिंग और अनुकूली तकनीक के लिए इसके नाटक ने इसरो को दुनिया में खड़ा कर दिया है। 1. मंगल ग्रह के मिशन के लिए पीएसएलवी सी 25 लॉन्च करें श्रीहरिकोटा: भारत ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर (इसरो) से पीएसएलवी सी 25 बोर्ड पर मंगल ग्रह के लिए अपना पहला मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया। मिशन 24 सितंबर, 2014 तक मंगल कक्षा तक पहुंचने की उम्मीद है। 2. श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर श्रीहरिकोटा: भारत ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर (इसरो) से पीएसएलवी सी 25 बोर्ड पर मंगल ग्रह के लिए अपना पहला मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया। मिशन 24 सितंबर, 2014 तक मंगल कक्षा तक पहुंचने की उम्मीद है। 3. पीएसएलवी सी 25 लॉन्च करें भारत ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर (इसरो) से पीएसएलवी सी 25 बोर्ड पर मंगल ग्रह पर अपना पहला मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया। मिशन 24 सितंबर, 2014 तक मंगल कक्षा तक पहुंचने की उम्मीद है। 4. भारत का पहला जीपीएस उपग्रह अंतरिक्ष आवेदन के एक नए युग में एक ऐतिहासिक यात्रा में, 1 जुलाई, 2013 को भारत ने ध्रुवीय उपग्रह लॉन्च वाहन का उपयोग करके अपना पहला समर्पित नेविगेशन उपग्रह सफलतापूर्वक लॉन्च किया जो सतीश धवन स्पेस सेंटर से विस्फोट हुआ।भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के लिए आईआरएनएसएस नामित, यह दुनिया के कुछ नेविगेशन सिस्टमों में से एक है और भारत के आसपास और आसपास नेविगेशन के लिए यूएस के स्वामित्व वाली जीपीएस (ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम) जैसी प्रणालियों का विकल्प प्रदान करेगा।आईआरएनएसएस में सात उपग्रह होते हैं, भूगर्भीय कक्षा में तीन और चार भूरे रंग के समेकित कक्षा में होते हैं, और मुख्य रूप से भारत के आसपास के क्षेत्र को कवर करेंगे।Isro Dwara Haliya Safal Pariyojanaen Hain Indian Space Research Organisation Isro Ko Kai Varshon Se Laagat Prabhavi Antariksh Mission Ke Saath Aane Ke Liye Jana Jata Hai Mitvyayi Engineering Aur Anukool Takneek Ke Liye Iske Natak Ne Isro Ko Duniya Mein Khada Kar Diya Hai Mangal Grah Ke Mission Ke Liye PSLV Si 25 Launch Karen Shreeharikota Bharat Ne Mangalwaar Ko Andhra Pradesh Ke Shreeharikota Mein Satish Dhavan Space Center Isro Se PSLV Si 25 Board Par Mangal Grah Ke Liye Apna Pehla Mission Safaltaapurvak Launch Kiya Mission 24 September 2014 Tak Mangal Kaksha Tak Pahuchne Ki Ummid Hai Shreeharikota Mein Satish Dhavan Space Center Shreeharikota Bharat Ne Mangalwaar Ko Andhra Pradesh Ke Shreeharikota Mein Satish Dhavan Space Center Isro Se PSLV Si 25 Board Par Mangal Grah Ke Liye Apna Pehla Mission Safaltaapurvak Launch Kiya Mission 24 September 2014 Tak Mangal Kaksha Tak Pahuchne Ki Ummid Hai PSLV Si 25 Launch Karen Bharat Ne Mangalwaar Ko Andhra Pradesh Ke Shreeharikota Mein Satish Dhavan Space Center Isro Se PSLV Si 25 Board Par Mangal Grah Par Apna Pehla Mission Safaltaapurvak Launch Kiya Mission 24 September 2014 Tak Mangal Kaksha Tak Pahuchne Ki Ummid Hai Bharat Ka Pehla GPS Upgrah Antariksh Avedan Ke Ek Naye Yug Mein Ek Aetihasik Yatra Mein 1 July 2013 Ko Bharat Ne Dharuvia Upgrah Launch Vaahan Ka Upyog Karke Apna Pehla Samarpit Navigation Upgrah Safaltaapurvak Launch Kiya Jo Satish Dhavan Space Center Se Visphot Hua Bhartiya Kshetriya Navigation Satellite System Ke Liye IRNSS Naamit Yeh Duniya Ke Kuch Navigation Sistamon Mein Se Ek Hai Aur Bharat Ke Aaspass Aur Aaspass Navigation Ke Liye Us Ke Swamitwa Wali GPS Global Pojishning System Jaisi Pranaleeyon Ka Vikalp Pradan Karega IRNSS Mein Saat Upgrah Hote Hain Bhugarbhiy Kaksha Mein Teen Aur Char Bhure Rang Ke Samekit Kaksha Mein Hote Hain Aur Mukhya Roop Se Bharat Ke Aaspass Ke Kshetra Ko Cover Karenge
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इसरो ने अंतरिक्ष की सैर के लिए तैयारी शुरू कर दी है ताकि इसरो किसी मानव को दिंसबर 2018 के पहले, अंतरिक्ष में भेज सके और वहां की जानकारी और भी अच्छे से जुटा सके। भारत ने चांद और मंगल ग्रहों पर अपने मिशन भेजे हैं लेकिन अंतरिक्ष में अपना आदमी भेजने का भारत का यह पहला महत्वाकांक्षी प्रयास होगा।
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इसरो ने अंतरिक्ष की सैर के लिए तैयारी शुरू कर दी है ताकि इसरो किसी मानव को दिंसबर 2018 के पहले, अंतरिक्ष में भेज सके और वहां की जानकारी और भी अच्छे से जुटा सके। भारत ने चांद और मंगल ग्रहों पर अपने मिशन भेजे हैं लेकिन अंतरिक्ष में अपना आदमी भेजने का भारत का यह पहला महत्वाकांक्षी प्रयास होगा। Isro Ne Antariksh Ki Sair Ke Liye Taiyari Shuru Kar Di Hai Taki Isro Kisi Manav Ko Dinsabar 2018 Ke Pehle Antariksh Mein Bhej Sake Aur Wahan Ki Jankari Aur Bhi Acche Se Juta Sake Bharat Ne Chand Aur Mangal Grahon Par Apne Mission Bheje Hain Lekin Antariksh Mein Apna Aadmi Bhejne Ka Bharat Ka Yeh Pehla Mahatvakankshi Prayas Hoga
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इसरो भारत देश से संबंधित है। यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भारत सरकार की अंतरिक्ष एजेंसी है जिसका मुख्यालय बैंगलोर शहर में स्थित है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) का निर्माण 15 अगस्त 1969 में, पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया था।
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इसरो भारत देश से संबंधित है। यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भारत सरकार की अंतरिक्ष एजेंसी है जिसका मुख्यालय बैंगलोर शहर में स्थित है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) का निर्माण 15 अगस्त 1969 में, पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा किया गया था।Isro Bharat Desh Se Sambandhit Hai Yeh Bhartiya Antariksh Anusandhan Sangathan Isro Bharat Sarkar Ki Antariksh Agency Hai Jiska Mukhyalay Bangalore Sheher Mein Sthit Hai Indian Space Research Organisation Isro Ka Nirman 15 August 1969 Mein Pehle Pradhan Mantri Jawaharlal Nehru Dwara Kiya Gaya Tha
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इसरो वैज्ञानिकों को सालाना वेतन लगभग ₹ 5 लाख 78 हजार से 6 लाख 20 हजार मिलता है। यह वेतन सबसे सर्वोच्च पोस्ट वाले वैज्ञानिकों को मिलती है। इनके नीचे काम करने वाले सभी वैज्ञानिकों को अपने-अपने पोस्ट के हिसाब से वेतन मिलता है।
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इसरो वैज्ञानिकों को सालाना वेतन लगभग ₹ 5 लाख 78 हजार से 6 लाख 20 हजार मिलता है। यह वेतन सबसे सर्वोच्च पोस्ट वाले वैज्ञानिकों को मिलती है। इनके नीचे काम करने वाले सभी वैज्ञानिकों को अपने-अपने पोस्ट के हिसाब से वेतन मिलता है।Isro Vaigyaanikon Ko Salana Vetan Lagbhag ₹ 5 Lakh 78 Hazar Se 6 Lakh 20 Hazar Milta Hai Yeh Vetan Sabse Sarvoch Post Wale Vaigyaanikon Ko Milti Hai Inke Neeche Kaam Karne Wale Sabhi Vaigyaanikon Ko Apne Apne Post Ke Hisab Se Vetan Milta Hai
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इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) का निर्माण 15 अगस्त 1969 में हुआ था। इसने "भारतीय राष्ट्रीय समिति के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान" (आईएनसीएसपीएआरएआर) का अधिग्रहण किया था, जिसे 1962 में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके करीबी प्रयासों के प्रयास से स्थापित किया गया था।
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इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) का निर्माण 15 अगस्त 1969 में हुआ था। इसने "भारतीय राष्ट्रीय समिति के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान" (आईएनसीएसपीएआरएआर) का अधिग्रहण किया था, जिसे 1962 में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके करीबी प्रयासों के प्रयास से स्थापित किया गया था।Indian Space Research Organisation Isro Ka Nirman 15 August 1969 Mein Hua Tha Isane Bhartiya Rashtriya Samiti Ke Liye Antariksh Anusandhan INCSPARAR Ka Adhigrahan Kiya Tha Jise 1962 Mein Swatantra Bharat Ke Pehle Pradhan Mantri Jawaharlal Nehru Aur Unke Karibi Prayaso Ke Prayas Se Sthapit Kiya Gaya Tha
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भारतीय राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष अंतरिक्ष आयोग के अंतर्गत आता है। अंतरिक्ष आयोग देश के सामाजार्थिक लाभार्थ अंतरिक्ष विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विकास और प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की नीति निर्धारित कर उनके क्रियान्वयन पर नज़र रखता है।
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भारतीय राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष अंतरिक्ष आयोग के अंतर्गत आता है। अंतरिक्ष आयोग देश के सामाजार्थिक लाभार्थ अंतरिक्ष विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विकास और प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की नीति निर्धारित कर उनके क्रियान्वयन पर नज़र रखता है। Bhartiya Raash Tree Antariksh Antariksh Aayog Ke Antargat Aata Hai Antariksh Aayog Desh Ke Samajarthik Labharth Antariksh Vigyan V Praudyogiki Ke Vikash Aur Prayog Ko Badhawa Dene Ke Liye Bhartiya Antariksh Karyakram Ki Niti Nirdharit Kar Unke Kriyanwayan Par Nazar Rakhta Hai
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