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समाज और धर्म के दुश्मनों से कैसे निपटें? ...

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समाज और धर्म के दुश्मनों से आप प्रेम से निपटें खुद से प्रेम करें और उनसे भी प्रेम करें समय ईश्वर को देखें सब में वही चेतना है सब कुछ ठीक हो जाएगा धन्यवाद...
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समाज और धर्म के दुश्मनों से आप प्रेम से निपटें खुद से प्रेम करें और उनसे भी प्रेम करें समय ईश्वर को देखें सब में वही चेतना है सब कुछ ठीक हो जाएगा धन्यवाद
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सवाल है कि समाज और अधर्म के दुश्मन से कैसे हैं लिखते हैं यह एक ऐसा सवाल है जो जो बहुत ही गौर करने वाली बात है पहले तो यह समझना यहां होगा कि यहां दो चीजें हैं आपने समाज और धर्म की बात की और दुश्मन की ब...
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सवाल है कि समाज और अधर्म के दुश्मन से कैसे हैं लिखते हैं यह एक ऐसा सवाल है जो जो बहुत ही गौर करने वाली बात है पहले तो यह समझना यहां होगा कि यहां दो चीजें हैं आपने समाज और धर्म की बात की और दुश्मन की बात की है नीतीश जी बात है दुश्मन और चौथी बात है कि इससे निपटने की तो जब तक आप समाज को नहीं समझेंगे धर्म को नहीं समझेंगे तब तक आप इससे निपटने वाली बात नहीं समझ पाएंगे आए निपटना क्या है यहां निपटना क्या है क्या निपटना है समाज और धर्म के हैं कोई दुश्मन है तो वह कैसे हैं क्यों है उसकी वजह क्या है यह समझना होगा और रात किस संदर्भ में उसे दुश्मन समझते हैं यह समझना बहुत ही जरूरी है क्योंकि समाज को पहले अगर हम समझे कि आप समझ इसको थोड़ी सी बारीकी से समझ ही अपने गंभीर सवाल किए हैं और इस को बहुत गंभीरता से आप को समझना चाहिए हम और आप से ही तो समाज बना है समाज कैसे बना कहां से बना कोई ऊपर से बारिश हुई ऐसा तो है नहीं कि समाज की बारिश हो गई हम इंसानों ने ऐसे ही समाज बनता है तो सबसे पहले तो हम हम इंसान हैं यही एक समाज है और हम और आप से ही बना हुआ चीज समाज कहलाता है कहलाता है समाज दूसरा हमारी और आपसे बना हुआ चीज है धर्म जिसका हम पालन करते हैं जिसके में अनुशासन एक गाइडलाइन है लाइफ को जीने का एक थॉट है उसके अंदर एक नियम कानून में एक कह सकते हैं कि एक संविधान ने बनाया की लाइफ को का कोई बहुत बड़ा आंसर ढूंढना हो तो यहां जाकर ढूंढ सकते हैं धर्मों में ढूंढ सकते हैं और अपनी लाइफ में किसी भी चीज को करने का एक अनुशासन होना चाहिए एक कहीं न कहीं हर इंसान के लिए एक मार्गदर्शक का का की तरह इंसान ने सोचा होगा कि कभी न कभी किसी कालखंड में है कि कोई एक मार्गदर्शन होना चाहिए कोई कितना किसी को एक दूसरे को जाकर कहेगा समझाएगा बताएगा तो जो भी एक जगह बैठ कर या एक समाज जब मैं इंसान इकट्ठा हुआ होगा तो एक अनुशासन के लिए एक मार्गदर्शन के लिए जो भी ज्ञान इकट्ठे हुए होंगे प्राप्त हुए होंगे उस आधार पर एक धर्म बनाया गया था कि प्रकृति की भी तमाम जिलों की भी के बीच कैसे रहा जाए उसका पालन कैसे किया जाए कैसे कैसे जिया जाए तो इसका एक एक धर्म बनाया गया और उस मार्ग पर चलने का कमिटमेंट किया गया और वह उसी कमिटमेंट का पालन अब तक लोग करते रहे हैं तो नया उसी आधार पर धर्म ग्रंथ का तैयार किए गए और धर्म तैयार किए गए और मैं जो भी चीजें मेंशन होगी वह समाज में यह तय हुआ कि इसका पालन करना है अगर कोई उसका पालन नहीं करता है या उसके विरोध में कोई बातें करता है तो हम मानते हैं कि यह धर्म का दुश्मन है या जो समाज है हम और आप है जो समूह है उसमें से अगर कोई उन चीजों को मानता नहीं है तो हम उसे कहते हैं कि वह समाज का दुश्मन है जो गाइडलाइन है वह नहीं फॉलो करता है जो समूह में होता है उसको अगर कोई न करता है वह कोई भी दूसरा समूह तो हम कहते हैं कि वह समाज का दुश्मन है ऐसी कई और बातें हो सकती है दुश्मन मानने के तो समाज कैसे बना धर्म कैसे बना इन बातों को समझने के बाद अब हम आते हैं कि इसको जो भी पालन नहीं करते हैं या इनको इन सब चीजों से इनकार करते हैं उनको दुश्मन हम मानते हैं तो देखें क्या है कि जैसे-जैसे समय कालखंड बढ़ता चला गया आ गया उस हिसाब से इंसान के ब्रेन परिपक्व होते गए इंसान का प्लेन बदलाव करता गया और जो जो कई सदियों से चीजें कहीं जा रहे हैं उनको मानते हुए अब तक इंसान बढ़ रहे हैं उसके अंदर जो बातें लिखी हुई है उनके इनकी खोज में लगे हुए हैं उसमें से आज की तारीख में जो ब्रेन है जिस इंसान का भी ब्रेन है हो सकता है कि उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहा हो उसको स्वीकार नहीं कर रहा हो तो यह इस समूह में उसे समझा के उस को प्रमाणित करने की जरूरत है इसके धर्म में जो भी बातें लिखी हुई है वह साबित नहीं हुई है बहुत सारी चीजें लेकिन उसमें से जो साबित हो गई वह साइंस कहलाया धर्म में अभी भी बहुत सारी बातें हैं जो प्रूफ नहीं हुए हैं जो भी प्रूफ हुए हैं वह सारी बातें साइंस कहलाई तो साइंस इन चीजों को प्रूफ करता गया उसको धर्म से में लिखे हुए ग्रंथ से भी मिलाकर देखा गया तो वह दिखा तो वहां एक धर्म की प्रमाणिकता भी बनती चली गई तो साइंस जो है ना वह प्रमाणित हुई चीजें हैं वह साइंस है जो प्रमाणित नहीं हुई है उनको प्रमाणित करना अभी बाकी भी है उसको धर्म में जो भी बातें कहीं गई है उसको हम गलत कि नहीं कह सकते हैं क्योंकि उनको उससे अभी काम करना बाकी है उसमें उसे प्रूफ करना बाकी है और घर में जो भी बातें लिखी गई हैं साइंस से पहले धर्म की बातें लिखी हुई है तो आज तो बहुत नए युग की बात है तो यह चीजें साइंस भी बहुत सारी चीजों को धर्म की बात नहीं मानता तो उसे आप दुश्मन कह सकते हैं या दुश्मन कहेंगे तो ऐसी बात नहीं है फिर उससे निपटने की बात होगी तो यह बात बहुत ही क्लियर है कि समाज हो या धर्म हो उससे उसके जो भी दुश्मन है या नहीं उसको फॉलो नहीं करने वाले को ही आप दुश्मन कहेंगे ना तो उनको आप या तो उससे कोई नुकसान है तो उन्हें समझा-बुझाकर उन्हें उस चीज के प्रति प्रमाणित प्रमाणिकता के साथ उसको प्रस्तुत करेंगे तो निश्चित तौर पर यह निपटने का एक बेहतर तरीका होगा उसे दुश्मन न मानते हुए धर्म के प्रति उनकी आस्था ना होने की वजह जानकर उसको उस यह जिज्ञासा को हम अगर पूर्ति करते हैं जो दुश्मन जिसे आप मानते हैं उसके अंदर विरोध करने के कारण को अगर हम जानते हैं और उस कारण को अगर हम उसकी जिज्ञासा मानते हैं कि हो सकता है उसके अंदर यह जिज्ञासा है कि यह ना माने और क्यों हम माने तो उसे उसकी जिज्ञासा को हम अगर पूरा करते हैं उसका आंसर देते हैं तो निश्चित तौर पर वह दुश्मन फिर नहीं रह जाएगा तो जो भी अगस्त में बातें होती है उनके कारण ढूंढना बहुत जरूरी है और कारण का निवारण ढूंढना होगा अगर निवारण नहीं जुड़ेंगे तो ऐसी स्थितियां बनी रहेगी तो बहुत ही जरूरी है कि ऐसी चीजों को निपटने के लिए उसके कारण को ढूंढना होगा और धर्म के पालन करने वाले और धर्म ग्रंथों से ही हो उसका हल निक निकालकर समाज के लोगों को बैठकर उसका हल निकालना चाहिए और जो भी दुश्मन है उनकी जो जिज्ञासा है उनके उनके आंसर उसको मिलनी चाहिए जिज्ञासा की पूर्ति करनी होगी तभी जाकर उसे निपटा जा सकता है तो यही है मुझे लगता है कि एक बेहतर रास्ता होगा इसके समाज को और धर्म को जो भी है वह हम लोगों ने बनाए हुए हैं हम लोगों के की वजह से ही यह सारी चीजें तैयार हुई है हम इंसानों की वजह से ही और हम इंसान हैं उसमें से दुश्मन होते हैं तो इंसान इंसान के बीच का यह मसला है जो इंसान इंसान बैठकर ही इसे सॉल्व कर सकता है थैंक यू
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इंसान अच्छे कर्म को कर कर के उसके अंदर जागृति पैदा कर सकते हैं उसको प्रेम को जगा कर उसके अंदर के मीणा को हटाकर नक्षत्र के लिए तो अच्छा की होली आ सकते हैं...
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इंसान अच्छे कर्म को कर कर के उसके अंदर जागृति पैदा कर सकते हैं उसको प्रेम को जगा कर उसके अंदर के मीणा को हटाकर नक्षत्र के लिए तो अच्छा की होली आ सकते हैंInsaan Acche Karm Ko Kar Kar Ke Uske Andar Jagriti Paida Kar Sakte Hain Usko Prem Ko Jagah Kar Uske Andar Ke Meena Ko Hatakar Nakshtra Ke Liye Toh Accha Ki Holi Aa Sakte Hain
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समाज और धर्म के दो दुश्मन होते हैं यह ज्यादातर ऐसे होते हैं जो समाज में धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं ऐसे लोगों से निपटने के लिए हमें ऐसे लोगों को समाज में बोलने की जगह नहीं देनी चाहिए ना ही किसी का...
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समाज और धर्म के दो दुश्मन होते हैं यह ज्यादातर ऐसे होते हैं जो समाज में धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं ऐसे लोगों से निपटने के लिए हमें ऐसे लोगों को समाज में बोलने की जगह नहीं देनी चाहिए ना ही किसी कार्य में शामिल करना चाहिएSamaaj Aur Dharam Ke Do Dushman Hote Hain Yeh Jyadatar Aise Hote Hain Jo Samaaj Mein Dharam Ke Naam Par Rajneeti Karte Hain Aise Logon Se Nipatane Ke Liye Humein Aise Logon Ko Samaaj Mein Bolne Ki Jagah Nahi Deni Chahiye Na Hi Kisi Karya Mein Shaamil Karna Chahiye
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