किसने भारत और पाकिस्तान को विभाजित किया? ...

सन् 1945 तक गांधी का युग खत्म होकर नेहरू का जमाना शुरू हो गया था। दोनों के बीच के फर्कों पर बात करने की मानो परंपरा-सी रही है, पर इन फर्कों का स्वतंत्रता के संघर्ष के परिणाम से संबंध ज्यादातर अंधेरे में रहा है। न ही वे फर्क हमेशा साफ-साफ पकड़ में आते हैं। नेहरू एक पीढ़ी छोटे, देखने में सुंदर, काफी ऊंचे सामाजिक वर्ग से आए, पश्चिम की अभिजात शिक्षा प्राप्त, धार्मिक विश्वासों से रहित थे और उनके कई प्रेम-संबंध भी थे, ये बातें सभी को पता हैं। गांधी के साथ उनका अनोखा संबंध यहां राजनीतिक तौर पर ज्यादा प्रासंगिक है। राष्ट्रीय आंदोलन में अपने अमीर पिता, जो 1890 के दशक से ही कांग्रेस के स्तंभ थे, द्वारा भर्ती करवाए गए नेहरू पर गांधी का जादू तब चला जब वह तीस की उम्र के करीब थे और जब उनके अपने राजनीतिक विचार उतने विकसित नहीं हुए थे। एक दशक पश्चात् जब उन्होंने स्वतंत्रता और समाजवाद की संकल्पनाएं ग्रहण कर ली थीं जिनसे गांधी इत्तफाक नहीं रखते थे और लगभग चालीस के हो चुके थे तब भी वह गांधी को लिख रहे थे, ‘क्या मैं आप ही की राजनीतिक औलाद नहीं हूं, गो कि किसी कदर नाफरमां-बरदार और बिगड़ी औलाद?’ वल्दियत वाली बात अपनी जगह सही है; पर नाफरमानी (या अवज्ञा) दरअसल नाफरमानी कम, नखरा ज्यादा था। बहुतों की तरह 1922 में गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की हवा निकाल देने से हताश, 1932 में अछूतों का निर्वाचन मंडल शुरू करने के खिलाफ उनके अनशन से निराश, 1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने के गांधी के कारणों से चकित, नेहरू फिर भी हर बार अपने सरपरस्त के फैसले के आगे अपने आपको झुका देते। राष्ट्रीय आंदोलन का पवित्रीकरण? ‘हमारी राजनीति में इस धार्मिक तत्व के बढऩे से मैं कभी-कभी परेशान हो जाता,’ मगर ‘मुझे अच्छी तरह पता था कि उसमें कोई और चीज है, जो मनुष्यों की गहन आतंरिक लालसा की पूर्ति करती है।’ असहयोग आंदोलन की असफलता? ‘आखिर वह (गांधी) इसके लेखक और प्रवर्तक थे और वह आंदोलन क्या था और क्या नहीं इस बात का निर्णय उनसे बेहतर कौन कर सकता था। और उनके बिना हमारे आंदोलन का अस्तित्व ही कहां था?’ पूना का आमरण अनशन? ‘दो दिनों तक मैं अन्धकार में था और आशा की कोई किरण नहीं नजर आती थी, गांधीजी जो कर रहे थे उस काम के चंद परिणामों के बारे में सोच कर मेरा दिल बैठता जाता …फिर एक अजीब-सी बात हुई। एकदम भावनात्मक संकट जैसा हुआ और उसके बाद मुझे शांति महसूस हुई और भविष्य उतना अंधकारमय नहीं लगा। मनोवैज्ञानिक क्षण में सही चीज करने का अद्भुत कौशल गांधीजी के पास था और मुमकिन है कि उनके किए के – जिसे सही ठहराना मेरे दृष्टिकोण से नामुमकिन सा था- बहुत अच्छे परिणाम होंगे।’ और वह दावा कि बिहार में भूकंप भेज कर ईश्वर ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति अप्रसन्नता दर्शाई थी? बापू की घोषणा ने नेहरू को उनके विश्वास के ‘लंगर से दूर खदेड़ दिया’ मगर यह मानकर कि उनके सरपरस्त का किया सही है उन्होंने ‘जैसे-तैसे समझौता कर लिया।’ क्योंकि ‘आखिरकार गांधीजी क्या ही अद्भुत व्यक्ति थे।’ ये सारी घोषणाएं 1936 के जमाने की हैं जब नेहरू अपने समूचे कैरियर के किसी भी कालखंड के मुकाबले राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा रैडिकल थे। इतने कि साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखते थे। 1939 के आते-आते वे सीधे-सीधे यह प्रमाणित कर रहे थे, ‘भारत का उनके (गांधी के) बिना कुछ नहीं होगा।’
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सन् 1945 तक गांधी का युग खत्म होकर नेहरू का जमाना शुरू हो गया था। दोनों के बीच के फर्कों पर बात करने की मानो परंपरा-सी रही है, पर इन फर्कों का स्वतंत्रता के संघर्ष के परिणाम से संबंध ज्यादातर अंधेरे में रहा है। न ही वे फर्क हमेशा साफ-साफ पकड़ में आते हैं। नेहरू एक पीढ़ी छोटे, देखने में सुंदर, काफी ऊंचे सामाजिक वर्ग से आए, पश्चिम की अभिजात शिक्षा प्राप्त, धार्मिक विश्वासों से रहित थे और उनके कई प्रेम-संबंध भी थे, ये बातें सभी को पता हैं। गांधी के साथ उनका अनोखा संबंध यहां राजनीतिक तौर पर ज्यादा प्रासंगिक है। राष्ट्रीय आंदोलन में अपने अमीर पिता, जो 1890 के दशक से ही कांग्रेस के स्तंभ थे, द्वारा भर्ती करवाए गए नेहरू पर गांधी का जादू तब चला जब वह तीस की उम्र के करीब थे और जब उनके अपने राजनीतिक विचार उतने विकसित नहीं हुए थे। एक दशक पश्चात् जब उन्होंने स्वतंत्रता और समाजवाद की संकल्पनाएं ग्रहण कर ली थीं जिनसे गांधी इत्तफाक नहीं रखते थे और लगभग चालीस के हो चुके थे तब भी वह गांधी को लिख रहे थे, ‘क्या मैं आप ही की राजनीतिक औलाद नहीं हूं, गो कि किसी कदर नाफरमां-बरदार और बिगड़ी औलाद?’ वल्दियत वाली बात अपनी जगह सही है; पर नाफरमानी (या अवज्ञा) दरअसल नाफरमानी कम, नखरा ज्यादा था। बहुतों की तरह 1922 में गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की हवा निकाल देने से हताश, 1932 में अछूतों का निर्वाचन मंडल शुरू करने के खिलाफ उनके अनशन से निराश, 1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने के गांधी के कारणों से चकित, नेहरू फिर भी हर बार अपने सरपरस्त के फैसले के आगे अपने आपको झुका देते। राष्ट्रीय आंदोलन का पवित्रीकरण? ‘हमारी राजनीति में इस धार्मिक तत्व के बढऩे से मैं कभी-कभी परेशान हो जाता,’ मगर ‘मुझे अच्छी तरह पता था कि उसमें कोई और चीज है, जो मनुष्यों की गहन आतंरिक लालसा की पूर्ति करती है।’ असहयोग आंदोलन की असफलता? ‘आखिर वह (गांधी) इसके लेखक और प्रवर्तक थे और वह आंदोलन क्या था और क्या नहीं इस बात का निर्णय उनसे बेहतर कौन कर सकता था। और उनके बिना हमारे आंदोलन का अस्तित्व ही कहां था?’ पूना का आमरण अनशन? ‘दो दिनों तक मैं अन्धकार में था और आशा की कोई किरण नहीं नजर आती थी, गांधीजी जो कर रहे थे उस काम के चंद परिणामों के बारे में सोच कर मेरा दिल बैठता जाता …फिर एक अजीब-सी बात हुई। एकदम भावनात्मक संकट जैसा हुआ और उसके बाद मुझे शांति महसूस हुई और भविष्य उतना अंधकारमय नहीं लगा। मनोवैज्ञानिक क्षण में सही चीज करने का अद्भुत कौशल गांधीजी के पास था और मुमकिन है कि उनके किए के – जिसे सही ठहराना मेरे दृष्टिकोण से नामुमकिन सा था- बहुत अच्छे परिणाम होंगे।’ और वह दावा कि बिहार में भूकंप भेज कर ईश्वर ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति अप्रसन्नता दर्शाई थी? बापू की घोषणा ने नेहरू को उनके विश्वास के ‘लंगर से दूर खदेड़ दिया’ मगर यह मानकर कि उनके सरपरस्त का किया सही है उन्होंने ‘जैसे-तैसे समझौता कर लिया।’ क्योंकि ‘आखिरकार गांधीजी क्या ही अद्भुत व्यक्ति थे।’ ये सारी घोषणाएं 1936 के जमाने की हैं जब नेहरू अपने समूचे कैरियर के किसी भी कालखंड के मुकाबले राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा रैडिकल थे। इतने कि साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखते थे। 1939 के आते-आते वे सीधे-सीधे यह प्रमाणित कर रहे थे, ‘भारत का उनके (गांधी के) बिना कुछ नहीं होगा।’San 1945 Tak Gandhi Ka Yug Khatam Hokar Nehru Ka Jamana Shuru Ho Gaya Tha Dono Ke Bich Ke Par Baat Karne Ki Maano Parampara Si Rahi Hai Par In Ka Svatantrata Ke Sangharsh Ke Parinam Se Sambandh Jyadatar Andhere Mein Raha Hai N Hi Ve Fark Hamesha Saaf Saaf Pakad Mein Aate Hain Nehru Ek Pidhi Chote Dekhne Mein Sundar Kafi Unche Samajik Varg Se Aaye Paschim Ki Abhijat Shiksha Prapt Dharmik Vishwashon Se Rahit The Aur Unke Kai Prem Sambandh Bhi The Yeh Batein Sabhi Ko Pata Hain Gandhi Ke Saath Unka Anokha Sambandh Yahan Rajnitik Taur Par Jyada Prasangik Hai Rashtriya Aandolan Mein Apne Amir Pita Jo 1890 Ke Dashak Se Hi Congress Ke Stambh The Dwara Bharti Karvaye Gaye Nehru Par Gandhi Ka Jadu Tab Chala Jab Wah Ki Umar Ke Karib The Aur Jab Unke Apne Rajnitik Vichar Utne Viksit Nahi Huye The Ek Dashak Paschat Jab Unhone Svatantrata Aur Samajavad Ki Grahan Kar Lee Thi Jinse Gandhi Nahi Rakhate The Aur Lagbhag Chalis Ke Ho Chuke The Tab Bhi Wah Gandhi Ko Likh Rahe The Kya Main Aap Hi Ki Rajnitik Aulad Nahi Hoon Go Ki Kisi Kadar Aur Bigadi Aulad Wali Baat Apni Jagah Sahi Hai Par Ya Awagya Darasal Kam Jyada Tha Ki Tarah 1922 Mein Gandhi Dwara Asahayog Aandolan Ki Hawa Nikal Dene Se Hathaash 1932 Mein Ka Nirvachan Mandal Shuru Karne Ke Khilaf Unke Anshan Se Nirash 1934 Mein Savinay Awagya Aandolan Ko Sthagit Karne Ke Gandhi Ke Kaarno Se Chakit Nehru Phir Bhi Har Bar Apne Ke Faisle Ke Aage Apne Aapko Jhuka Dete Rashtriya Aandolan Ka Hamari Rajneeti Mein Is Dharmik Tatva Ke Se Main Kabhi Kabhi Pareshan Ho Jata Magar Mujhe Acchi Tarah Pata Tha Ki Usamen Koi Aur Cheez Hai Jo Manusyon Ki Gahan Aantarik Lalasa Ki Purti Karti Hai Asahayog Aandolan Ki Asafaltaa Aakhir Wah Gandhi Iske Lekhak Aur Prawartak The Aur Wah Aandolan Kya Tha Aur Kya Nahi Is Baat Ka Nirnay Unse Behtar Kaun Kar Sakta Tha Aur Unke Bina Hamare Aandolan Ka Astitv Hi Kahan Tha Puna Ka Aamaran Anshan Do Dinon Tak Main Mein Tha Aur Asha Ki Koi Kiran Nahi Nazar Aati Thi Gandhiji Jo Kar Rahe The Us Kaam Ke Chand Parinamo Ke Bare Mein Soch Kar Mera Dil Baithta Jata Phir Ek Ajib Si Baat Hui Ekdam Bhavnatmak Sankat Jaisa Hua Aur Uske Baad Mujhe Shanti Mahsus Hui Aur Bhavishya Utana Andhakarmay Nahi Laga Manovaigyanik Kshan Mein Sahi Cheez Karne Ka Adbhut Kaushal Gandhiji Ke Paas Tha Aur Mumkin Hai Ki Unke Kiye Ke – Jise Sahi Thaharana Mere Drishtikon Se Namumkin Sa Tha Bahut Acche Parinam Honge Aur Wah Daawa Ki Bihar Mein Bhukamp Bhej Kar Ishwar Ne Savinay Awagya Aandolan Ke Prati Darshaii Thi Bapu Ki Ghoshana Ne Nehru Ko Unke Vishwas Ke Langar Se Dur Diya Magar Yeh Manakar Ki Unke Ka Kiya Sahi Hai Unhone Jaise Samjhauta Kar Liya Kyonki Aakhirkaar Gandhiji Kya Hi Adbhut Vyakti The Yeh Saree Ghoshanaen 1936 Ke Jamaane Ki Hain Jab Nehru Apne Carrier Ke Kisi Bhi Ke Muqable Rajnitik Taur Par Sabse Jyada The Itne Ki Samyawadi Vichardhara Ke Prati Jhukav Rakhate The 1939 Ke Aate Aate Ve Seedhe Seedhe Yeh Pramanit Kar Rahe The Bharat Ka Unke Gandhi Ke Bina Kuch Nahi Hoga
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