भारत में जैन धर्म का संस्थापक कौन है? ...

भारत मैं जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है | दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे | और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है, वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे | मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है, आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है |
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भारत मैं जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है | दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे | और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। वैदिक साहित्य में जिन यतियों और व्रात्यों का उल्लेख मिलता है, वे ब्राह्मण परंपरा के न होकर श्रमण परंपरा के ही थे | मनुस्मृति में लिच्छवि, नाथ, मल्ल आदि क्षत्रियों को व्रात्यों में गिना है, आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है |Bharat Main Jain Dharm Ka Sansthapak Rishabh Dev Ko Mana Jata Hai | Duniya Ke Sabse Prachin Dharm Jain Dharm Ko Shramanon Ka Dharm Kaha Jata Hai Jain Dharm Ka Sansthapak Rishabh Dev Ko Mana Jata Hai Jo Jain Dharm Ke Pehle Tirthkar The | Aur Bharat Ke Chakravarti Samrat Bharat Ke Pita The Vedon Mein Pratham Tirthkar Rishabhnath Ka Ullekh Milta Hai Vaidik Sahitya Mein Jin Yatiyon Aur Vratyon Ka Ullekh Milta Hai Ve Brahman Parampara Ke N Hokar Shraman Parampara Ke Hi The | Manusmriti Mein Lichhavi Nath Mall Aadi Chattriyo Ko Vratyon Mein Gina Hai Aaryon Ke Kaal Mein Rishabhanatha Aur Arishtanemi Ko Lekar Jain Dharm Ki Parampara Ka Vernon Bhi Milta Hai |
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भारत में जैन धर्म का संस्थापक कौन है? - जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा गया है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव है, यह जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता भी थे।
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भारत में जैन धर्म का संस्थापक कौन है? - जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा गया है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव है, यह जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता भी थे।Bharat Mein Jain Dharm Ka Sansthapak Kaon Hai - Jain Dharm Ko Shramanon Ka Dharm Kaha Gaya Hai Jain Dharm Ka Sansthapak Rishabh Dev Hai Yeh Jain Dharm Ke Pehle Tirthkar The Aur Bharat Ke Chakravarti Samrat Bharat Ke Pita Bhi The
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महावीर स्वामी जैनों के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर थे। ये जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक माने जाते है। जैन धर्म भारत के प्राचीन धर्म में से एक है। जैन धर्म का उद्भव की स्थिति अस्पष्ट है। महावीर का जन्म 540 ई. पू. वैशाली के निकट कुन्डग्राम में हुआ था। भारत की 1.028 अरब जनसंख्या में 4,200,000 लोग जैन धर्म के अनुयायी हैं | जैन धर्म की अत्यंत प्राचीनता करने वाले अनेक उल्लेख अ-जैन साहित्य और विशेषकर वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं।
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महावीर स्वामी जैनों के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर थे। ये जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक माने जाते है। जैन धर्म भारत के प्राचीन धर्म में से एक है। जैन धर्म का उद्भव की स्थिति अस्पष्ट है। महावीर का जन्म 540 ई. पू. वैशाली के निकट कुन्डग्राम में हुआ था। भारत की 1.028 अरब जनसंख्या में 4,200,000 लोग जैन धर्म के अनुयायी हैं | जैन धर्म की अत्यंत प्राचीनता करने वाले अनेक उल्लेख अ-जैन साहित्य और विशेषकर वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं। Mahavir Swami Jainon Ke Ve Tatha Antim Tirthkar The Yeh Jain Dharm Ke Vastavik Sansthapak Mane Jaate Hai Jain Dharm Bharat Ke Prachin Dharm Mein Se Ek Hai Jain Dharm Ka Udbhav Ki Sthiti Aspast Hai Mahavir Ka Janm 540 Ee Poo Vaishali Ke Nikat Kundagram Mein Hua Tha Bharat Ki 1.028 Arab Jansankhya Mein 4,200,000 Log Jain Dharm Ke Anuyaayi Hain | Jain Dharm Ki Atyant Praachinata Karne Wali Anek Ullekh A Jain Sahitya Aur Visheshakar Vaidik Sahitya Mein Prachur Matra Mein Hain
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दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। लेकिन कुछ लोगों का मानना है, कि यह हिन्‍दू धर्म का ही हिस्‍सा है और भगवान महावीर द्वारा इसकी स्‍थापना की गई । मगर यह बात पूर्णत: गलत है, महावीर स्‍वामी ने तो जैन धर्म का आधुनिक समय में प्रवर्तन किया था न की जैन धर्म की स्‍थापना । महावीर स्‍वामी जी जैन धर्म के चौबासवें तीर्थंकर थे और उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे, जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार है- श्री ऋषभदेव जी, श्री अजितनाथ जी, श्री संभवनाथ, श्री अभिनंदननाथ जी, श्री सुमतिनाथ जी, श्री पद्मप्रभु जी, श्री सुपार्श्‍वनाथ जी, श्री चंद्रप्रभु जी, श्री पुष्‍पदंत जी, श्री शीतलनाथ जी, श्री श्रेयांशनाथ जी, श्री वासुपूज्‍य जी, श्री विमलनाथ जी, श्री अनंतनाथ जी, श्री धर्मनाथ जी, श्री शांतिनाथ जी, श्री कुंथूनाथ जी, श्री अरहनाथ जी, श्री मल्लिनाथ जी, श्री मुनिसुव्रतनाथ जी, श्री नमीनाथ जी, श्री नेमिनाथ जी, श्री पार्श्‍वनाथ जी । इन सभी तीर्थंकरों ने समय-समय पर अवतरित होकर धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया।
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दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। लेकिन कुछ लोगों का मानना है, कि यह हिन्‍दू धर्म का ही हिस्‍सा है और भगवान महावीर द्वारा इसकी स्‍थापना की गई । मगर यह बात पूर्णत: गलत है, महावीर स्‍वामी ने तो जैन धर्म का आधुनिक समय में प्रवर्तन किया था न की जैन धर्म की स्‍थापना । महावीर स्‍वामी जी जैन धर्म के चौबासवें तीर्थंकर थे और उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे, जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार है- श्री ऋषभदेव जी, श्री अजितनाथ जी, श्री संभवनाथ, श्री अभिनंदननाथ जी, श्री सुमतिनाथ जी, श्री पद्मप्रभु जी, श्री सुपार्श्‍वनाथ जी, श्री चंद्रप्रभु जी, श्री पुष्‍पदंत जी, श्री शीतलनाथ जी, श्री श्रेयांशनाथ जी, श्री वासुपूज्‍य जी, श्री विमलनाथ जी, श्री अनंतनाथ जी, श्री धर्मनाथ जी, श्री शांतिनाथ जी, श्री कुंथूनाथ जी, श्री अरहनाथ जी, श्री मल्लिनाथ जी, श्री मुनिसुव्रतनाथ जी, श्री नमीनाथ जी, श्री नेमिनाथ जी, श्री पार्श्‍वनाथ जी । इन सभी तीर्थंकरों ने समय-समय पर अवतरित होकर धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया।Duniya Ke Sabse Prachin Dharm Jain Dharm Ko Shramanon Ka Dharm Kaha Jata Hai Jain Dharm Ka Sansthapak Rishabh Dev Ko Mana Jata Hai Jo Jain Dharm Ke Pehle Tirthkar The Aur Bharat Ke Chakravarti Samrat Bharat Ke Pita The Lekin Kuch Logon Ka Manana Hai Ki Yeh Hin‍du Dharm Ka Hi His‍sa Hai Aur Bhagwan Mahavir Dwara Iski S‍thapna Ki Gayi Magar Yeh Baat Purnat Galat Hai Mahavir S‍vami Ne To Jain Dharm Ka Aadhunik Samay Mein Pravartan Kiya Tha N Ki Jain Dharm Ki S‍thapna Mahavir S‍vami G Jain Dharm Ke Chaubasaven Tirthkar The Aur Unse Pehle 23 Tirthkar Ho Chuke The Jinke Naam Kramash Is Prakar Hai Shri Rishabhanatha G Shri Ajitnath G Shri Sambhavnath Shri Abhinandannath G Shri Sumatinath G Shri Padmaprabhu G Shri Suparsh‍vnath G Shri Chandraprabhu G Shri Push‍padant G Shri Sheetalnath G Shri Shreyanshnath G Shri Vasupuj‍y G Shri Vimalnath G Shri Anantnath G Shri Dharmnath G Shri Shantinath G Shri Kunthunath G Shri Arahnath G Shri Mallinath G Shri Munisuvratnath G Shri Naminath G Shri Neminath G Shri Parsh‍vnath G In Sabhi Tirthankaron Ne Samay Samay Par Avtarit Hokar Dharm Tirth Ka Pravartan Kiya
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दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है। जैन धर्म भारत का एक प्राचीन धर्म है जो सिखाता है कि मुक्ति और आनंद का मार्ग हानिरहित और त्याग का जीवन जीना है। जैन जीवन का उद्देश्य आत्मा की मुक्ति प्राप्त करना है। भगवान महावीर के समय से कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं।
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दुनिया के सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म को श्रमणों का धर्म कहा जाता है। जैन धर्म का संस्थापक ऋषभ देव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर थे और भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता थे। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है। जैन धर्म भारत का एक प्राचीन धर्म है जो सिखाता है कि मुक्ति और आनंद का मार्ग हानिरहित और त्याग का जीवन जीना है। जैन जीवन का उद्देश्य आत्मा की मुक्ति प्राप्त करना है। भगवान महावीर के समय से कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं।Duniya Ke Sabse Prachin Dharm Jain Dharm Ko Shramanon Ka Dharm Kaha Jata Hai Jain Dharm Ka Sansthapak Rishabh Dev Ko Mana Jata Hai Jo Jain Dharm Ke Pehle Tirthkar The Aur Bharat Ke Chakravarti Samrat Bharat Ke Pita The Aaryon Ke Kaal Mein Rishabhanatha Aur Arishtanemi Ko Lekar Jain Dharm Ki Parampara Ka Vernon Bhi Milta Hai Jain Dharm Bharat Ka Ek Prachin Dharm Hai Jo Sikhata Hai Ki Mukti Aur Anand Ka Marg Haanirahit Aur Tyag Ka Jeevan Jeena Hai Jain Jeevan Ka Uddeshya Aatma Ki Mukti Prapt Karna Hai Bhagwan Mahavir Ke Samay Se Kuch Log Visheshakar European Vidvaan Jain Dharm Ka Prachalit Hona Manate Hain
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