हिंदी के वर्णमाला में कितने स्वर और कितने व्यंजन होते हैं ? ...

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हिंदी वर्णमाला में 11 स्वर होते हैं और जो है 33 व्यंजन होते हैं...
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हिंदी वर्णमाला में 11 स्वर होते हैं और जो है 33 व्यंजन होते हैंHindi Varnmala Mein 11 Swar Hote Hain Aur Jo Hai 33 Vyanjan Hote Hain
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हिंदी वर्णमाला में जो टोटल नंबर ऑफ अक्षर होते हैं यानी कि बहुत सोते हैं वही 11 होते हैं...
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हिंदी वर्णमाला में जो टोटल नंबर ऑफ अक्षर होते हैं यानी कि बहुत सोते हैं वही 11 होते हैंHindi Varnmala Mein Jo Total Number Of Akshar Hote Hain Yani Ki Bahut Sote Hain Wahi 11 Hote Hain
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हिंदी वर्णमाला में कुल 11 स्वर होते हैं और 33 व्यंजन होते हैं...
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हिंदी वर्णमाला में कुल 11 स्वर होते हैं और 33 व्यंजन होते हैंHindi Varnmala Mein Kul 11 Swar Hote Hain Aur 33 Vyanjan Hote Hain
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स्वर:-स्वर तीन प्रकार के होते हैं। 1. ह्स्व स्वर 2. दीर्घ स्वर 3. प्लुत स्वर व्यंजन :-जिन वर्णों का उच्चारण स्वर की सहायता से होता है उन्हें व्यंजन कहते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं। 1. स्पर्श व्यंजन 2. अन्तस्थ व्यंजन 3. उष्म व्यंजन
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स्वर:-स्वर तीन प्रकार के होते हैं। 1. ह्स्व स्वर 2. दीर्घ स्वर 3. प्लुत स्वर व्यंजन :-जिन वर्णों का उच्चारण स्वर की सहायता से होता है उन्हें व्यंजन कहते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं। 1. स्पर्श व्यंजन 2. अन्तस्थ व्यंजन 3. उष्म व्यंजन Swar Swar Teen Prakar Ke Hote Hain Hswa Swar 2. Dirgh Swar 3. Plut Swar Vyanjan Jin Varnon Ka Ucharan Swar Ki Sahaayata Se Hota Hai Unhen Vyanjan Kehte Hain Yeh Teen Prakar Ke Hote Hain Sparsh Vyanjan Antasth Vyanjan Ushm Vyanjan
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हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। हिंदी के वर्णमाला में स्वरों की संख्या 11 होती हैं। अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, (ऋ), ए, ऐ, ओ, औ, (ऑ)। और हिंदी के वर्णमाला में व्यंजन की संख्या 33 होती हैं। क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, स, ष, ह, ळ, क्ष, ज्ञ |
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हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। हिंदी के वर्णमाला में स्वरों की संख्या 11 होती हैं। अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, (ऋ), ए, ऐ, ओ, औ, (ऑ)। और हिंदी के वर्णमाला में व्यंजन की संख्या 33 होती हैं। क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, स, ष, ह, ळ, क्ष, ज्ञ | Hindi Varnmala Mein 44 Vern Hain Hindi Ke Varnmala Mein Swaro Ki Sankhya 11 Hoti Hain A Aa E Ee U U Ree A Ae O Oh A Aur Hindi Ke Varnmala Mein Vyanjan Ki Sankhya 33 Hoti Hain K Kh G Gh N Ch Chh J Jh Na T Th Da Dh Na Ta Th The Dh N P F B Bh M Ya R L V Sh S Sh H L Ksh Jha |
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वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते हैं। इसमें 48 वर्ण होते हैं और 11 स्वर होते हैं। व्यंजनों की संख्या 33 होती है जबकि कुल व्यंजन 35 होते हैं। दो उच्छिप्त व्यंजन एवं दो अयोगवाह होते हैं। वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं।वैसे तो जहाँ भी दो अथवा दो से अधिक व्यंजन मिल जाते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं, किन्तु देवनागरी लिपि में संयोग के बाद रूप-परिवर्तन हो जाने के कारण इन तीन को गिनाया गया है।
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वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते हैं। इसमें 48 वर्ण होते हैं और 11 स्वर होते हैं। व्यंजनों की संख्या 33 होती है जबकि कुल व्यंजन 35 होते हैं। दो उच्छिप्त व्यंजन एवं दो अयोगवाह होते हैं। वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं।वैसे तो जहाँ भी दो अथवा दो से अधिक व्यंजन मिल जाते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं, किन्तु देवनागरी लिपि में संयोग के बाद रूप-परिवर्तन हो जाने के कारण इन तीन को गिनाया गया है।Varnon Ke Samuh Ko Varnmala Kehte Hain Isme 48 Vern Hote Hain Aur 11 Swar Hote Hain Vyanjanon Ki Sankhya 33 Hoti Hai Jabki Kul Vyanjan 35 Hote Hain Do Ucchipt Vyanjan Evam Do Ayogavah Hote Hain Varnon Ke Samuday Ko Hi Varnmala Kehte Hain Jin Varnon Ke Poorn Ucharan Ke Liye Swaro Ki Sahaayata Lee Jati Hai Ve Vyanjan Kahalate Hain Inhen Panch Vargon Mein Rakha Gaya Hai Aur Har Varg Mein Panch Panch Vyanjan Hain Waise To Jahan Bhi Do Athwa Do Se Adhik Vyanjan Mil Jaate Hain Ve Samyukt Vyanjan Kahalate Hain Kintu Devnagari Lipi Mein Sanyog Ke Baad Roop Pariwartan Ho Jaane Ke Kaaran In Teen Ko Ginaya Gaya Hai
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‍हिन्दी वर्ण की परिभाषा - हिन्दी भाषा में प्रयुक्त सबसे छोटी ध्वनि वर्ण कहलाती है। जैसे-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क्, ख् आदि। > हिन्दी वर्णमाला- वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिन्दी वर्णमाला के दो भेद किए गए हैं- 1. स्वर 2. व्यंजन 1.स्वर- जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता हो और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक हों वे स्वर कहलाते है। ये संख्या में ग्यारह हैं- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। उच्चारण के समय की दृष्टि से स्वर के तीन भेद किए गए हैं- 1. ह्रस्व स्वर। 2. दीर्घ स्वर। 3. प्लुत स्वर। 1.ह्रस्व स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में कम-से-कम समय लगता हैं उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं। ये चार हैं- अ, इ, उ, ऋ। इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं। 2.दीर्घ स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगता है उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। ये हिन्दी में सात हैं- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। विशेष- दीर्घ स्वरों को ह्रस्व स्वरों का दीर्घ रूप नहीं समझना चाहिए। यहां दीर्घ शब्द का प्रयोग उच्चारण में लगने वाले समय को आधार मानकर किया गया है। 3.प्लुत स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में दीर्घ स्वरों से भी अधिक समय लगता है उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। प्रायः इनका प्रयोग दूर से बुलाने में किया जाता है। मात्राएँ स्वरों के बदले हुए स्वरूप को मात्रा कहते हैं स्वरों की मात्राएँ निम्नलिखित हैं- स्वर मात्राएँ शब्द अ × - कम आ ा - काम इ ि - किसलय ई ी - खीर उ ु - गुलाब ऊ ू - भूल ऋ ृ - तृण ए े - केश ऐ ै - है ओ ो - चोर औ ौ - चौखट अ वर्ण (स्वर) की कोई मात्रा नहीं होती। व्यंजनों का अपना स्वरूप निम्नलिखित हैं- क् च् छ् ज् झ् त् थ् ध् आदि। अ लगने पर व्यंजनों के नीचे का (हल) चिह्न हट जाता है। तब ये इस प्रकार लिखे जाते हैं- क च छ ज झ त थ ध आदि। व्यंजन जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। अर्थात व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते। ये संख्या में 33 हैं। इसके निम्नलिखित तीन भेद हैं- 1. स्पर्श 2. अंतःस्थ 3. ऊष्म 1.स्पर्श- इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं। हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है। जैसे- कवर्ग- क् ख् ग् घ् ड़् चवर्ग- च् छ् ज् झ् ञ् टवर्ग- ट् ठ् ड् ढ् ण् (ड़् ढ्) तवर्ग- त् थ् द् ध् न् पवर्ग- प् फ् ब् भ् म् 2.अंतःस्थ- यह निम्नलिखित चार हैं- य् र् ल् व् 3.ऊष्म- ये निम्नलिखित चार हैं- श् ष् स् ह् जहाँ भी दो अथवा दो से अधिक व्यंजन मिल जाते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं, किन्तु देवनागरी लिपि में संयोग के बाद रूप-परिवर्तन हो जाने के कारण इन तीन को गिनाया गया है। ये दो-दो व्यंजनों से मिलकर बने हैं। जैसे-क्ष=क्+ष अक्षर त्र=त्+र नक्षत्र ज्ञ=ज्+ञ ज्ञान कुछ लोग क्ष् त्र् और ज्ञ् को भी हिन्दी वर्णमाला में गिनते हैं, पर ये संयुक्त व्यंजन हैं। अतः इन्हें वर्णमाला में गिनना उचित प्रतीत नहीं होता। अनुस्वार- इसका प्रयोग पंचम वर्ण के स्थान पर होता है। इसका चिन्ह (ं) है। जैसे- सम्भव=संभव, सञ्जय=संजय, गड़्गा=गंगा। विसर्ग- इसका उच्चारण ह् के समान होता है। इसका चिह्न (:) है। जैसे-अतः, प्रातः। चंद्रबिंदु- जब किसी स्वर का उच्चारण नासिका और मुख दोनों से किया जाता है तब उसके ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगा दिया जाता है। यह अनुनासिक कहलाता है। जैसे-हँसना, आँख। लेकिन आजकल आधुनिक पत्रकारिता में सुविधा और स्थान की दृष्टि से चंद्रबिन्दु को लगभग हटा दिया गया है। लेकिन भाषा की शुद्धता की दृष्टि से चन्द्र बिन्दु लगाए जाने चाहिए। हिन्दी वर्णमाला में 11 स्वर तथा 33 व्यंजन गिनाए जाते हैं, परन्तु इनमें ड़्, ढ़् अं तथा अः जोड़ने पर हिन्दी के वर्णों की कुल संख्या 48 हो जाती है। हलंत- जब कभी व्यंजन का प्रयोग स्वर से रहित किया जाता है तब उसके नीचे एक तिरछी रेखा (्) लगा दी जाती है। यह रेखा हल कहलाती है। हलयुक्त व्यंजन हलंत वर्ण कहलाता है। जैसे-सतत् ‍ वर्णों के उच्चारण-स्थान मुख के जिस भाग से जिस वर्ण का उच्चारण होता है उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते हैं।
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‍हिन्दी वर्ण की परिभाषा - हिन्दी भाषा में प्रयुक्त सबसे छोटी ध्वनि वर्ण कहलाती है। जैसे-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क्, ख् आदि। > हिन्दी वर्णमाला- वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिन्दी वर्णमाला के दो भेद किए गए हैं- 1. स्वर 2. व्यंजन 1.स्वर- जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता हो और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक हों वे स्वर कहलाते है। ये संख्या में ग्यारह हैं- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। उच्चारण के समय की दृष्टि से स्वर के तीन भेद किए गए हैं- 1. ह्रस्व स्वर। 2. दीर्घ स्वर। 3. प्लुत स्वर। 1.ह्रस्व स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में कम-से-कम समय लगता हैं उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं। ये चार हैं- अ, इ, उ, ऋ। इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं। 2.दीर्घ स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगता है उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। ये हिन्दी में सात हैं- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। विशेष- दीर्घ स्वरों को ह्रस्व स्वरों का दीर्घ रूप नहीं समझना चाहिए। यहां दीर्घ शब्द का प्रयोग उच्चारण में लगने वाले समय को आधार मानकर किया गया है। 3.प्लुत स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में दीर्घ स्वरों से भी अधिक समय लगता है उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं। प्रायः इनका प्रयोग दूर से बुलाने में किया जाता है। मात्राएँ स्वरों के बदले हुए स्वरूप को मात्रा कहते हैं स्वरों की मात्राएँ निम्नलिखित हैं- स्वर मात्राएँ शब्द अ × - कम आ ा - काम इ ि - किसलय ई ी - खीर उ ु - गुलाब ऊ ू - भूल ऋ ृ - तृण ए े - केश ऐ ै - है ओ ो - चोर औ ौ - चौखट अ वर्ण (स्वर) की कोई मात्रा नहीं होती। व्यंजनों का अपना स्वरूप निम्नलिखित हैं- क् च् छ् ज् झ् त् थ् ध् आदि। अ लगने पर व्यंजनों के नीचे का (हल) चिह्न हट जाता है। तब ये इस प्रकार लिखे जाते हैं- क च छ ज झ त थ ध आदि। व्यंजन जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। अर्थात व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते। ये संख्या में 33 हैं। इसके निम्नलिखित तीन भेद हैं- 1. स्पर्श 2. अंतःस्थ 3. ऊष्म 1.स्पर्श- इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं। हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है। जैसे- कवर्ग- क् ख् ग् घ् ड़् चवर्ग- च् छ् ज् झ् ञ् टवर्ग- ट् ठ् ड् ढ् ण् (ड़् ढ्) तवर्ग- त् थ् द् ध् न् पवर्ग- प् फ् ब् भ् म् 2.अंतःस्थ- यह निम्नलिखित चार हैं- य् र् ल् व् 3.ऊष्म- ये निम्नलिखित चार हैं- श् ष् स् ह् जहाँ भी दो अथवा दो से अधिक व्यंजन मिल जाते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं, किन्तु देवनागरी लिपि में संयोग के बाद रूप-परिवर्तन हो जाने के कारण इन तीन को गिनाया गया है। ये दो-दो व्यंजनों से मिलकर बने हैं। जैसे-क्ष=क्+ष अक्षर त्र=त्+र नक्षत्र ज्ञ=ज्+ञ ज्ञान कुछ लोग क्ष् त्र् और ज्ञ् को भी हिन्दी वर्णमाला में गिनते हैं, पर ये संयुक्त व्यंजन हैं। अतः इन्हें वर्णमाला में गिनना उचित प्रतीत नहीं होता। अनुस्वार- इसका प्रयोग पंचम वर्ण के स्थान पर होता है। इसका चिन्ह (ं) है। जैसे- सम्भव=संभव, सञ्जय=संजय, गड़्गा=गंगा। विसर्ग- इसका उच्चारण ह् के समान होता है। इसका चिह्न (:) है। जैसे-अतः, प्रातः। चंद्रबिंदु- जब किसी स्वर का उच्चारण नासिका और मुख दोनों से किया जाता है तब उसके ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगा दिया जाता है। यह अनुनासिक कहलाता है। जैसे-हँसना, आँख। लेकिन आजकल आधुनिक पत्रकारिता में सुविधा और स्थान की दृष्टि से चंद्रबिन्दु को लगभग हटा दिया गया है। लेकिन भाषा की शुद्धता की दृष्टि से चन्द्र बिन्दु लगाए जाने चाहिए। हिन्दी वर्णमाला में 11 स्वर तथा 33 व्यंजन गिनाए जाते हैं, परन्तु इनमें ड़्, ढ़् अं तथा अः जोड़ने पर हिन्दी के वर्णों की कुल संख्या 48 हो जाती है। हलंत- जब कभी व्यंजन का प्रयोग स्वर से रहित किया जाता है तब उसके नीचे एक तिरछी रेखा (्) लगा दी जाती है। यह रेखा हल कहलाती है। हलयुक्त व्यंजन हलंत वर्ण कहलाता है। जैसे-सतत् ‍ वर्णों के उच्चारण-स्थान मुख के जिस भाग से जिस वर्ण का उच्चारण होता है उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते हैं। ‍hindi Vern Ki Paribhasha - Hindi Bhasha Mein Prayukt Sabse Choti Dhwani Vern Kahalati Hai Jaise A Aa E Ee U U Kk Kh Aadi > Hindi Varnmala Varnon Ke Samuday Ko Hi Varnmala Kehte Hain Hindi Varnmala Mein 44 Vern Hain Ucharan Aur Prayog Ke Aadhar Par Hindi Varnmala Ke Do Bhed Kiye Gaye Hain Swar Vyanjan Swar Jin Varnon Ka Ucharan Swatantra Roop Se Hota Ho Aur Jo Vyanjanon Ke Ucharan Mein Sahaayak Hon Ve Swar Kahalate Hai Yeh Sankhya Mein Gyarah Hain A Aa E Ee U U Ree A Ae O Oh Ucharan Ke Samay Ki Drishti Se Swar Ke Teen Bhed Kiye Gaye Hain Hraswa Swar Dirgh Swar 3. Plut Swar Hraswa Swar Jin Swaro Ke Ucharan Mein Kam Se Kam Samay Lagta Hain Unhen Hraswa Swar Kehte Hain Yeh Char Hain A E U Ree Inhen Mul Swar Bhi Kehte Hain Dirgh Swar Jin Swaro Ke Ucharan Mein Hraswa Swaro Se Duguna Samay Lagta Hai Unhen Dirgh Swar Kehte Hain Yeh Hindi Mein Saat Hain Aa Ee U A Ae O Oh Vishesh Dirgh Swaro Ko Hraswa Swaro Ka Dirgh Roop Nahi Samajhna Chahiye Yahan Dirgh Shabdh Ka Prayog Ucharan Mein Lagne Wali Samay Ko Aadhar Manakar Kiya Gaya Hai Plut Swar Jin Swaro Ke Ucharan Mein Dirgh Swaro Se Bhi Adhik Samay Lagta Hai Unhen Plut Swar Kehte Hain Prayah Inka Prayog Dur Se Bulane Mein Kiya Jata Hai Matraen Swaro Ke Badle Huye Swaroop Ko Matra Kehte Hain Swaro Ki Matraen Nimnlikhit Hain Swar Matraen Shabdh A × - Kam Aa A - Kaam E I - Kislay Ee I - Khir U U - Gulab U U - Bhul Ree Ri - Trin A E - Kesh Ae Ai - Hai O O - Chor Oh Au - Chaukhat A Vern Swar Ki Koi Matra Nahi Hoti Vyanjanon Ka Apna Swaroop Nimnlikhit Hain Kk Ch Ch J Jh T Th Dh Aadi A Lagne Par Vyanjanon Ke Neeche Ka Hal Chinh Hut Jata Hai Tab Yeh Is Prakar Likhe Jaate Hain K Ch Chh J Jh Ta Th Dh Aadi Vyanjan Jin Varnon Ke Poorn Ucharan Ke Liye Swaro Ki Sahaayata Lee Jati Hai Ve Vyanjan Kahalate Hain Arthat Vyanjan Bina Swaro Ki Sahaayata Ke Bole Hi Nahi Ja Sakte Yeh Sankhya Mein 33 Hain Iske Nimnlikhit Teen Bhed Hain Sparsh Antahsth 3. Ushm Sparsh Inhen Panch Vargon Mein Rakha Gaya Hai Aur Har Varg Mein Panch Panch Vyanjan Hain Har Varg Ka Naam Pehle Varg Ke Anusar Rakha Gaya Hai Jaise Kavarg Kk Kh Ga Gh D Chavarg Ch Ch J Jh Ny Tavarg T Th D Dh N D Dh Tavarg T Th D Dh Na Pavarg P F B Bh M Antahsth Yeh Nimnlikhit Char Hain Y R L V Ushm Yeh Nimnlikhit Char Hain Sh Sh Sa H Jahan Bhi Do Athwa Do Se Adhik Vyanjan Mil Jaate Hain Ve Samyukt Vyanjan Kahalate Hain Kintu Devnagari Lipi Mein Sanyog Ke Baad Roop Pariwartan Ho Jaane Ke Kaaran In Teen Ko Ginaya Gaya Hai Yeh Do Do Vyanjanon Se Milkar Bane Hain Jaise Ksh Kk Sh Akshar Tr T R Nakshtra Jha J Na Gyaan Kuch Log Ksh Tr Aur Gy Ko Bhi Hindi Varnmala Mein Ginate Hain Par Yeh Samyukt Vyanjan Hain Atah Inhen Varnmala Mein Ginana Uchit Pratit Nahi Hota Anuswar Iska Prayog Pancham Vern Ke Sthan Par Hota Hai Iska Chinh N Hai Jaise Sambhav Sambhav Sanjay Sanjay Gadga Ganga Visarg Iska Ucharan H Ke Saman Hota Hai Iska Chinh (:) Hai Jaise Atah Pratah Chandrabindu Jab Kisi Swar Ka Ucharan Nasika Aur Mukh Dono Se Kiya Jata Hai Tab Uske Upar Chandrabindu N Laga Diya Jata Hai Yeh Anunasik Kehlata Hai Jaise Hansanaa Aankh Lekin Aajkal Aadhunik Patrakarita Mein Suvidha Aur Sthan Ki Drishti Se Chandrabindu Ko Lagbhag Hata Diya Gaya Hai Lekin Bhasha Ki Shuddhta Ki Drishti Se Chandra Bindu Lagaye Jaane Chahiye Hindi Varnmala Mein 11 Swar Tatha 33 Vyanjan Ginaye Jaate Hain Parantu Inme D Dh An Tatha Ah Jodne Par Hindi Ke Varnon Ki Kul Sankhya 48 Ho Jati Hai Halant Jab Kabhi Vyanjan Ka Prayog Swar Se Rahit Kiya Jata Hai Tab Uske Neeche Ek Tirchi Rekha A Laga Di Jati Hai Yeh Rekha Hal Kahalati Hai Halyukt Vyanjan Halant Vern Kehlata Hai Jaise Satat ‍ Varnon Ke Ucharan Sthan Mukh Ke Jis Bhag Se Jis Vern Ka Ucharan Hota Hai Use Us Vern Ka Ucharan Sthan Kehte Hain
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वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। अर्थात् व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते। ये संख्या में 33 हैं।
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वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। अर्थात् व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते। ये संख्या में 33 हैं। Varnon Ke Samuday Ko Hi Varnmala Kehte Hain Hindi Varnmala Mein 44 Vern Hain Jin Varnon Ke Poorn Ucharan Ke Liye Swaro Ki Sahaayata Lee Jati Hai Ve Vyanjan Kahalate Hain Arthat Vyanjan Bina Swaro Ki Sahaayata Ke Bole Hi Nahi Ja Sakte Yeh Sankhya Mein 33 Hain
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